सरकारी शिक्षा का हाल बेहाल

आज के समय में अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में एड़मिशन कराने के बजाय निजी स्कूलों की ओर दौड़ते नजर आते है क्योंकि सरकारी स्कूलों की स्थिति अब सिर्फ मिड डे मील तक ही सीमित रह गई है। सबसे खास बात तो यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक भी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते है। जो खुद तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाते है। जिसके एवज में सरकार उनकों मोटी तनख्वाह भी देती है लेकिन वे भी उनसे कम तनख्वाह वाले ऐसे शिक्षक जो निजी स्कूलों में पढ़ाते है वहां अपने बच्चों का एड़मिशन कराते है अब आप खुद ही समझ जाइए। ऐसा नहीं है कि सभी सरकारी शिक्षक इन श्रेणी में आते है लेकिन उनकी संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है।
अभी हाल ही में सभी स्कूलों में प्रवेशोत्सव कार्यक्रम का आयोजन हुआ जिसमें सिरोही जिला मुख्यालय पर जहां एक ओर मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय, मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कार्यालय से चंद कदमों दूर विवेकानंद राजकीय मा. विद्यालय(सरकेएम स्कूल) में प्रवेशोत्सव कार्यक्रम जो कि सार्वजनिक जगह पर करना था लेकिन विद्यालय प्रशासन की लचर व्यवस्था के कारण अभिभावकों की उपस्थिति नहीं होने से स्कूल प्रशासन द्वारा परिणाम लेने आए बच्चों को इकट्ठा कर व बाहर बैठे लोगों को बुलाकर कार्यक्रम की लाज बचा पाए। इसके अलावा मुख्य अतिथि के रूप में आए मुख्य कार्यकारी अधिकारी नाथूसिंह राठौड़ ने भी अभिभावकों की पुष्टि करने के लिए सबसे हाथ खड़े करवाए उसमें मात्र तीन अभिभावक ही उपस्थित थे और वे भी अपने बच्चों का परीक्षा परीणाम लेने आए थे। प्रवेशोत्सव में एक-दो बच्चों का ही प्रवेश हो पाया जबकि इस स्कूल में लगभग 16 के आस-पास शिक्षक-शिक्षिकाएं पढ़ाते है। ऐसे है जिम्मेदार शिक्षक और शिक्षिकाएं। एक गौर करने वाली बात यह भी कि यहां मौजूद शिक्षक-शिक्षिकाएं के बच्चे सरकारी स्कूल में न पढ़ते हुए निजी स्कूलों में पढा़ई कर रहे है इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि फिर इन सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कैसा होगा। जिनके खुद के बच्चे तो निजी स्कूलों में पढ़ते है। वे फिर कैसे स्कूल में प्रवेशोत्सव में बच्चों का एडमिशन करा पाएंगे।

किसी भी देश का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर आधारित होता है। और देश को उच्च गुणवत्ता वाले और विकासशील बनाने के लिए योग्य व्यक्तियों की जरूरत होती है। वहींं उन्हीं योग्य व्यक्तियों को शिक्षित रूप से तराशने का दायित्व योग्य शिक्षक को होता है, तभी योग्य छात्र शिक्षित होकर देश के विकास में अपना योगदान देता है। लेकिन वर्तमान में सरकारी स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था काफी दयनीय स्थिति में है। एक ओर जहां आरटेट, बीएड और एमएड धारक जिन सरकारी स्कूलों में पढा रहें वहां के लगभग आठवीं या नवमीं स्तर के छात्रों को ठीक से पढना तक नहीं आता है। आखिर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर इतना नीचे क्यों गिर रहा है? इतने बडे स्तरीय शिक्षकों की देखरेख में इतनी नीचे स्तर की शिक्षा क्यों? क्या शिक्षक इन छात्रों को शिक्षा देना नहीं चाहता या किसी अन्य रूप से असमर्थ है? ये सवाल उन सभी अभिभावकों के मन में उठते होंगे जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढते है।
आइए जानते है कि आखिर सरकारी स्कूलों में गिरते शिक्षा के स्तर के कारण क्या है।
बच्चे निजी स्कूलों में और खुद स्कूली कार्य में व्यस्त, शिक्षा पस्त
सरकारी स्कूलों में पढाने वाले अधिकतर शिक्षकों के बच्चे निजी स्कूलों में पढते है और उन बच्चों के शिक्षा के स्तर के नापना इनकों भली-भांति आता है वहीं अपनी स्कू ल के छात्रों द्वारा दयनीय नजरों से ब्लैक बोर्ड पर लिखें किसी वाक्य को पढने की असमर्थता को जानने में ये शिक्षक क्यों असफल होते है। शिक्षा के गिरते स्तर में इन शिक्षकों ने कई कार्य भार अपने कंधों पर लाद रखे है जिनमें जनगणना, पोषाहार, बीएलओ, सर्वे, चुनावी कार्य जैसे ऐसे कार्यभार लेक र बैठे है जिनको यह शिक्षक छोडने का नाम ही नहीं ले रहे है। अपने दायित्व के विपरित कार्य करने के कारण ही सरकारी स्कूलों के छात्रों का शिक्षा स्तर गिर रहा है। वहीं ऐसे कई विषय विशेषज्ञ शिक्षक है जो 20-20 सालों ऐसे कई विभागों में प्रतिनियुक्ति के तौर बैठे है और शायद अपने पढाने की विषय विशेषज्ञता को लगभग भूल चुके है। ऐसे शिक्षकों के बारे में शिक्षा विभाग को पूर्ण जानकारी होने के बावजूद शासन और प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है। पूरे प्रदेशभर में ऐस कई शिक्षक है जो वर्ष में दो से चार दिन अपने मूल पदस्थापन स्थल पर ड्यूटी देते है और फिर अपनी मनमर्जी से जनप्रतिनिधियों की दया से अन्य सरकारी विभाग में प्रतिनियुक्ति पर चले जाते है। मतलब शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति कार्यालयों में बैठना, सरकारी स्कूलों के छात्रों की शिक्षा की कमजोर कड़ी भी है।
निजी बनाम सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली में अंतर की वजह से सरकारी स्कूल कमजोर
सरकारी स्कूलों की कमजोर शिक्षा का कारण निजी विद्यालयों और सरकारी विद्यालयों की शिक्षा प्रणाली में अंतर होना।
पहली वजह यह है की सरकारी स्कूलों का अंग्रेजी मिडियम ना होना छात्रों को कमजोर बनाती है, इसके उलट निजी स्कूलों में उनका मिडियम ही अंग्रेजी होता है जिससे इन स्कूलोंं के छात्र पढाई के प्रति सजग रहते है। वही सरकारी शिक्षकों को पढाई के अलावा अन्य कार्य सौंपे जाते है, जिस कारण इन स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था प्रभावित होती है। जबकि निजी विद्यालयों के शिक्षकों को अध्यापन करवाने के अलावा दूसरा अतिरिक्त कार्य नहीं दिया जाता है तभी उनके शिक्षा का स्तर ऊंचा रहता है। सरकारी शिक्षकों में योग्यता और अनुभव की कमी नहीं होती और उनके पास शिक्षण सम्बन्धित सभी सामग्री उपलब्ध होती है फिर भी इनके स्कूलों में कक्षा 6 से 8 तक के कई बच्चों को पढना नहीं आता। यह बेहद ही शर्मनाक बात है। वही निजी स्कूलों के शिक्षक, सरकारी शिक्षकों तरह योग्यता ना रखने वाले अल्प संसाधनों में भी उत्कृष्ट परिणाम देते है। साथ ही निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूल मेंं स्कूली शिक्षण व्यवस्था की मॉनिटरिंग की कमी पाई जाती है। निजी स्कूलो में प्रत्येक शिक्षक अपने विषय को लेकर हर कक्षा में जिम्मेदारी से कार्य करते है। अपने सिलेबस को विद्यार्थियों से पूर्ण करवाना और महिने के प्रत्येक सप्ताह में साप्ताहिक टेस्ट लेकर निजी स्कूल तभी बेहतरीन परिणाम प्रदान करता है। लेकिन सरकारी स्कूल की शिक्षण व्यवस्था में शिक्षा अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खडा होता है कि आखिर कोई भी शिक्षक अपने अध्यापन सम्बन्धित उदासीनता बरतता है तो उस पर उचित कार्रवाई क्यों नही की जाती? ताकि उचित परीक्षा परिणाम सरकारी स्कूल को मिल सकें। वही निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों मेें अभिभावक बैठकों का अभाव पाया जाता है जिस कारण अभिभावक अपने बच्चों के बारे में इतना जान नहीं पाते कि उसकी शिक्षण व्यवस्था किस प्रकार से चल रही है।
करें कार्रवाई लापरवाह अध्यापकों पर
निजी विद्यालयों के शिक्षक अपने कार्य के प्रति किसी भी प्रकार गलती नहीं करते, क्योंकि इनकी थोडी भी लापरवाही इनको अपनी नौकरी से हाथ धुलवा सकती है। इसलिए निजी विद्यालय के शिक्षक अपने कार्य प्रति सजग रहते है। वही सरकारी शिक्षकों को अपने नौकरी सम्बन्धित किसी प्रकार का भय नहीं होता। इसलिए अपने जॉब को यह सुरक्षित समझते है इसलिए अपने कार्य के प्रति लापरवाह बने हुए है। सरकार को ऐसे लापरवाह अध्यापकों के खिलाफ इस प्रकार कडे नियम बनाए कि वे अपने शिक्षण कार्य में शत-प्रतिशत परिणाम देवें और कार्य के प्रति लापरवाही बरतने पर कडी सजा का प्रावधान रखें। तभी सरकारी स्कूलों की स्थिति में बहुत कुछ बदलाव आएगा।
प्रवेशोत्सव के लुभावने वादे, शिक्षा नदारद
सरकारी विद्यालयों में प्रवेशोत्सव के दौरान शिक्षकों को अनिवार्य रूप से टारगेट दिया जाता है कि आपको इतने बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाना है। छात्र को प्रवेश दिलाने के बाद सरकारी शिक्षा, केवल मिड डे मिल और अन्नपूर्णा दुग्ध योजना पर ही समेट जाती है। छात्रों का आधा समय तो खाने और दुध पीने मेंं ही निकल जाता है और शिक्षा पीछे छुट जाती है। वर्तमान में अब अभिभावक भी ये जान चुके है कि यदि सरकारी स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिलवाकर अपने बच्चे की शिक्षण गुणवत्ता को कमजोर नहीं करना चाहते। वे अब मिड डे मिल के चक्कर में बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहते। इसलिए वे निजी विद्यालयों की ओर दौड रहे है और सरकारी विद्यालय के नामांकन कम होते जा रहे है। क्योंकि सरकारी स्कूल अब केवल मात्र बच्चों के खाने पीने तक ही सीमित रह गया है।
सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों द्वारा अध्यापन के प्रति उदासीनता से शिक्षा का स्तर दिन-ब-दिन निचले स्तर पर जा रहा है। वहीं शिक्षा विभाग द्वारा इन अधिकारियों को पाबंद करें कि नामांकन बढाने के लिए जब तक आप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों नहीं पढाओंगे तब तक, आमजन का विश्वास भी सरकारी स्कूलों पर नहीं होगा। वर्तमान में सिरोही जिले अधिकतर शिक्षकों के बच्चे निजी विद्यालयों पढ रहे है यहां तक जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक का बच्चा भी निजी स्कूल में पढ रहा है तो सरकारी स्कूल के शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा।
मंथन
सरकारी विद्यालय में पांचवी से आठवीं कक्षा में पहुंचकर भी छात्र-छात्रा पढने लिखने में कमजोर है, तो यह जिम्मेदारी शिक्षक की है, शिक्षक कहलाने का जो गौरव इनको मिला है, उसके आधार पर प्रत्येक शिक्षक को सोचना होगा कि ऐसी कौनसी विसंगति है जिसके कारण छात्र या छात्रा कमजोर है, जरूर मंथन करें।
ऐसे हुई गोल-मोल बाल सभा
सिरोही के विवेकानंद माध्यमिक स्कूल(सर के एम)में प्रवेशोत्सव के तहत बाल सभा का आयोजन किया गया। जिसमें स्कूल के नामांकित छात्रों तथा अभिभावकों का इस सभा में सक्रिय रूप से उपस्थित होने के लिए विद्यालय प्रबंधन के द्वारा उन्हें सूचित करना आवश्यक था। लेकिन इस सभा में छात्रों की संख्या दो चार पंगत के रूप में थी और अभिभावक तो दो या चार आए हुए थे। खास बात इस मिटिंग की ये रही की इसमें स्कूल के बाहर बैठे आम लोगों को भीड बढाने चक्कर में दो चार आदमियों को विद्यालय प्रबंधन ने बाल सभा मिटिंग में बुलाया। यह भी सीओ नाथूसिंह के द्वारा विद्यालय कार्यवाहक संस्था प्रधान दिनेश व्यास को फटकार लगाने के बाद कहा कि मिटिंग में शून्य के बराबर अभिभावक संख्या है।
भीड जुटाने में नेताओं से भी आगे है शिक्षक
जिस प्रकार नेता अपने चुनाव प्रचार में या अपनी सभा की शोभा बढाने के लिए पैसे देकर लोगों की भीड एकत्रित करते है वैसे ही अब शिक्षक भी इनकी राह पर चल पडे है। वाक्या सिरोही के विवेकानंद माध्यमिक स्कू ल (सर के एम) के प्रवेशोत्सव के बाल सभा के समय का है। इस मिटिंग में अभिभावकों इस सभा मेंं आने के लिए विद्यालय को सूचित करना था। लेकिन वर्तमान में आपको मालूम ही होगा कि सरकारी शिक्षक कार्य के प्रति काफी आलसी हो गया। यहां के शिक्षकों ने अपनी मिटिंग में भीड जुटाने के लिए नेताओं की तरह कार्य किया। बहुत शातिर तरीके के स्कूल के बाहर बैठे उम्रदराज और रिटायर आदमियों को अभिभावक बनाकर मिटिंग की शोभा बढाई। हालांकि इनकी भी मात्रा भी दो चार ही थी क्योंकि अभिभावकों की संख्या तो शून्य के बराबर थी। यह भी सीओ के मुख्य अतिथि के रूप में आने के बाद अभिभावकों की संख्या ना देखने के बाद विद्यालय प्रबंधन को लताड लगाने के कारण हुई।
प्रवेशोत्सव कार्यक्रम सर्वाजनिक ना होके गुप्त तरीके
सिरोही के विवेकानंद माध्यमिक स्कूल(सर के एम) प्रवेशोत्सव के तहत बाल सभा का कार्यक्रम अपने विद्यालय में ही रखा गया, जबकि प्रवेशोत्सव कार्यक्रम में नामांकन सम्बधित सूचना सार्वजनिक जगह पर होनी चाहिए। शहर में अन्य स्कूलों ने अपना प्रवेशोत्सव कार्यक्रम सार्वजनिक स्थलों पर आयोजित किया। लेकिन विवेकानंद स्कूल के प्रबंधन ने अपना कार्यक्रम बडे ही गुप्त तरीेके से आयोजित कर अपनी कमियों को उजागर किया है। इससे फिर साबित हो जाता है कि सरकारी शिक्षक अपने कार्य के प्रति कितने अनुशासनहीन और लापरवाह हो गए है।

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