सरकारी विभाग @ कमीशन

जनता की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए सरकार लाखों करोड़ों रू जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करती है। जिनमें बिजली, पानी, भोजन, सड़कें, बाँध, पुल, शिक्षा, मकान, शौचालय इसके अलावा सरकारी भवनों जैसे अस्पताल, स्कुले, सभागार आदि। लेकिन इन योजनाएं के फलीभूत होने पर इन सभी में कमीशन नामक दीमक लग जाता है। सरकार जनकल्याण के लिए लाखों करोड़ों रू का बजट पास करती है ताकि जनता को सारी सुख सुविधा मिल सके लेकिन जब यह बजट सरकारी विभागों में आता है तो छोटे से बड़े अधिकारी तक सभी की जीभ लपलभाने लग जाती है। क्योंकि इन बजटों के द्वारा जो कार्य जनता के लिए होगा उसमें से यह लोग ठेकेदार से 10 से 30 प्रतिशत कमीशन ले लेते है। जैसे मानो कि सरकार ने जनता के लिए 100 रू खर्च करने का बजट रखा जो इनमें से सीधा 10 से 30 प्रतिशत कमीशन सीधा इन विभागीय लोगो के पास ठेकेदार द्वारा चला जाता है ऐसा नहीं है कि इन लोगो को वेतन नहीं मिलता है इन लोगों को अच्छा वेतन मिलने के बावजूद भी रूपए कमाने की भूख इनको कमीशन की ओर धकेलती है। सरकार जनता के लिए एक शुद्ध योजना बनाकर भेजती है लेकिन इन लोगो द्वारा इन योजनाओं में मिलावट का धी लगाकर इसे अशुद्ध बना दिया जाता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि टोल नाके पर टैक्स भरने के उपरांत भी आपको घटिया सडक पर ऊबड-खाबड रास्ते का सफर तय करना पडता है, क्यों नये नवेले सरकारी भवनों में दरारें आ जाती है, क्यों शहर के सीसी रोड जल्द ही जर्जर हो जाते है, क्यों आखिर क्यों? इसका जवाब है कि हमारे सार्वजनिक विकास कार्यो में किसी ने मिलावट कर दी तभी तो यह निर्माण कार्य समय से पहले दम तोड जाते है। इस मिलावट में शामिल होने वाले पात्रो में अभियंता, आला अधिकारी, जनप्रतिनिधि, क्र्लक है जो एक चैन के रूप में कमीशन से युक्त मिलावट का घोल तैयार करते है और फिर घटिया निर्माण की पोल आपके सामने होती है।
घटिया निर्माण कार्य के बारे में धरातल पर जाकर देखें तो कार्यदायी संस्था और अधिकारियों का गठजोड भी घटिया काम के लिए कम उत्तरदायी नहीं है। कमीशन में हिस्सा पाने के लिए शुरू से लेकर अंत तक की भागीदारी सरकारी मुलाजिमों द्वारा निभाई जाती है। कमीशन के खेल में निर्माण कार्य बहुत हद तक प्रभावित होता है।
खास बात यह है कि ग्राम पंचायत, नगरपालिका, जल संसाधन विभाग, पंचायतीराज विभाग, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिक विभाग और सार्वजनिक निर्माण विभाग व रमसा द्वारा ही सर्वाधिक निर्माण कार्य करवाए जाते हैं तथा इन महकमों द्वारा किए जाने वाले हर निर्माण कार्य में सभी काकमीशन तय होता है। शहर और गांवो की सडको और भवनों के निर्माण में क्र्लक से लेकर अभियंता, अधिकारी और जनप्रतिनिधियों का कमीशन कम से कम पांच से दस फीसदी तय होता है। वहीं निर्माण कार्य के बिल भगुतान में दो से दस फीसदी तक कमीशन पक्का होता है। कमीशनखोरी का ऐसा खून इनके मुंह लगा है कि इनको मोटी तनख्वाह मिलने के बावजूद यह अफसर और कर्मचारी कमीशन के चक्कर में इधर-उधर मुंह मारते है। कमीशनखोरी के मायाजाल में यह घटिया निर्माण कार्य करवाते है। इनके घटिया कामों को लेकर हर तरफ से इनके विरोध में खूब आवाजें उठती हैं और कई घटिया कार्यो की पोल खुल चुकी है लेकिन इन मिलावटखोरों के अंदर कमीशन नाम की ऐसी मिलावट घुल-मिल गई है कि वे जनता को उच्च गुणवत्तापूर्ण निर्माण कार्य देने में सक्षम नहीं है। मतलब कमीशन के मारे यह गुणवत्ता कहां से लाएं।
एक ओर जिले में सडकों का हाल बेहाल है। ग्राम स्तरीय सडकों की बात कौन करे जब राज मार्ग एवं जिला स्तरीय मार्गों की ही सडकें गड्डे रूपी जख्म से कराह रही हैं, जिससे यातायात प्रभावित होता है और दुर्घटना का खतरा सदा बना रहता है। दरअसल दुर्घटना का जिम्मेदार केवल बिना हेलमेट पहनने वाला व्यक्ति ही नहीं होता वरन गड्डेनुमा और जर्जर सडके भी दुर्घटना की उत्तरदायी होती है। जिम्मेदारों की उदासीनता से निर्माण कार्यों की गुणवत्ता लगातार गिर रही, जिससे सडकें बनने के कुछ दिनों बाद ही उखडने लगती हैं। कमीशनखोरी का नशा इस हद तक पहुंच गया है कि इनको ना तो बडे अधिकारियों का खौफ और ना सरकार का डर है। अब खुलेआम कमीशन की डिमांड ठेकेदारों से की जा रही है। अभी तक ठेकेदार निर्माण के कामों में इंजीनियर से लेकर अधिकारियों तक उनका हिस्सा देते थे लेकिन अब पार्षदों ने भी अपनी हिस्सेदारी तय कर दी है। क्योंकि यह पार्षद अपने इलाके में निर्माण कार्य करवाने की एवज में अपना भी हिस्से का कमीशन मांगते है। कमीशन और गफलत का खेल स्थानीय जिला मुख्यालय पर भी देखना मिला है। जिले के कृष्णपुरी स्थित पुलिये के पास का सडक पिछले वर्ष फरवरी माह में जर्जर हो गई थी जिसको नगर परिषद की ओर से मरम्मत करवाई गई। इस सडक को साल भर भी नहीं हुआ और यह सडक फिर से उसी अवस्था में आई गई और फिर उस पर रफ्फू करवाया गया। तो क्या इन ठेकेदारों के पास इतना मजबूत सीमेंट या डामर नहीं है जो इस सडक को साल भर से ज्यादा मजबूती प्रदान करें। यह कमीशन का ही खेल है तभी सडक पर डामर चिपकता नहीं। शहर में पिछले वर्ष गौरव पथ निर्माण में घटिया सडक बनाने पर पार्षद जीतू खत्री ने खुलेआम पीडब्लूडी अधिकारी को बेटूक शब्दो में कहा था कि पैसे खाओ मगर उसकी भी लीमिट होती है। क्या ऐसे शब्दो से भी इनका जमीर इनकों धिक्कारता नहीं। बेशर्मी का चोलो पहने यह अधिकारी फिर भी कमीशन लेने से बाज नहीं आते।
कमीशन का खेल, कभी-कभी निकालता है इनका भी तेल
देश भर में कमीशन खोरो की कमी नहीं है लेकिन कुछ जागरूक जनता इनके मनसूबो पर ऐसा पानी फेरती है कि रिश्वत रूपी कमीशन इनको भारी पड जाता है। आइए देखते है कुछ देशभर के कमीशनखोरो की कहानी जो रंगे हाथो पकडे गए।
केस-1
पिछले वर्ष अगस्त माह मेंं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो कमीशन लेने के चक्कर में सार्वजनिक निमार्ण विभाग के अधिशाषी अभियंंता को दस हजार और कार्यालय अधिक्षक को बीस हजार की रिश्वत ठेकेदार से लेने के आरोप में जयपुर स्थित कार्यालय में रंगे हाथो गिरफ्तार किया। उन पर यह आरोप था कि अभियन्ताओं ने रिश्वत की यह राशि बिल पास करने की एवज में ठेकेदार से 2 प्रतिशत कमीशन के तौर पर मांगी थी। वही इसमें अधिक्षण अभियंता के भी लिप्त होने की जांच हुई।
केस नं-2
गत वर्ष झांसी के महोबा क्षेत्र में अवर अभियंता की शिकायत पर लोक निर्माण विभाग के एक लिपिक को एंटी करप्शन ब्यूरो की टीम 25 हजार की रिश्वत लेते रंगे हाथो पकडा। आरोप है कि दो साल पहले चरखारी मुस्करा मार्ग पर ठेकेदार ने एक पुलिया का निर्माण किया था। पुलिया की गुणवत्ता खराब होने के कारण अवर अभियंता ने एमबी (मेजरमेंट बुक) करने से इंकार कर दिया। इसके बाद भी विभाग से ठेकेदार का भुगतान कर दिया गया और अवर अभियंता को एमबी न करने पर अधिशासी अभियंता की तरफ से निलंबित करने की धमकी दी गई। अधिशासी अभियंता ने लेखा लिपिक के माध्यम से निलंबन न करने के लिए 50 हजार रुपए की मांग की। जिसमें आधी रकम तुरंत और आधी बाद में देने की बात तय हुई थी । शिकायत के बाद एंटी करप्शन टीम ने मामले की जांच की तो आरोप सही पाए थे। तय कार्यक्रम के अनुसार अभियंता ने लिपिक को 25 हजार रुपये दिए। इसी के साथ तत्काल एंटी करप्शन टीम ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
केस नं-3
बंूदी के हिण्डौली के निवरईया पंचायत के ग्राम सचिव को गिरफ्तार किया। सचिव ने परिवादी से निवरईया पंचायत के विभिन्न कार्यो के बकाया बिलो के भुगतान के लिए संविदा शुल्क मांगा था। यह रकम हिण्डौली मेंं पेच की बावडी के पास एक होटल में देना तय हुआ। पंचायत सचिव ये राशि अपने दलाल को दिलवाई। उसके बाद एसीबी ने तुरंत दलाल के पास से बीस हजार नौ रूपये बरामद कर दलाल और सचिव दोनों को गिरफ्तार किया।
केस नं -4
गत 22 जनवरी 2019 को हरियाणा के हिसार जिला क्षेत्र में हिसार विजीलेंस की टीम ने नगर निगम बिल्डिंग ब्रांच कर्मचारी को 2500 रूपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। जानकारी के अनुसारी मिलगेट निवासी किसी व्यक्ति की माता के नाम का प्लाट था जिसकी एनओसी लेनी थी। व्यक्ति ने प्लाट की फीस भी भर दी थी लेकिन उनको प्लॉट की एनओसी का लेटर नहीं मिला था, जिसकी एवज में कर्मचारी उनसे तीन हजार की रिश्वत मांग रहा था। इस मामलात मेंं व्यक्ति की शिकायत के बाद विजीलेंस पुलिस ने कर्मचारी को 2500 रूपए रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। पुलिस ने भ्रष्ट्राचार अधिनियम के तहत मुकद्मा दर्ज किया।
केस नं-5
गत वर्ष नवम्बर में उत्तर प्रदेश के सीतापुर में अधिशाषी अधिकारी नगर पालिका परिषद सीतापुर के कंट्रक्शन ठेकेदार से 100000 रूपये लेते रंगे हाथों विजिलेंस टीम ने किया गिरफ्तार किया। उत्तर प्रदेश जनपद सीतापुर में नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी ने कन्ट्रक्शन में भुगतान कराने के लिए ढाई लाख रुपए मांगे थे लेकिन कंट्रक्शन ठेकेदार ने 100000 रुपये देने के लिए राजी हुए जिसमे ईओ ने कहा की मैं कलक्ट्रेट में हूं वहीं आ जाओ। ठेकेदार ने विजिलेन्स टीम को पहले से सूचना दे रखी थी विजिलेंस टीम के सामने एक लाख रूपये दिये जिसमे उन्होंने उसी समय अधिशासी अधिकारी को रंगे हाथो गिरफ्तार कर लिया ।

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