मौत के सौदागर गड्ढों से स्वराज कब तक

अप्रैल 2014 में उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित सड़क सुरक्षा समिति की रिपोर्ट पर अदालत ने चिंता व्यक्त की है। देश में सड़क पर गड्ढों के कारण लगातार बढ़ते मौतों के आंकड़ों पर समिति की रिपोर्ट ने एक बार फिर से सार्वजनिक निर्माण विभाग से लेकर पंचायतों, प्राधिकरणों, प्रशासन और नगर निकायों के दावों की पोल खोल दी है। उच्चतम न्यायालय ने पूर्व न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली अदालत की सड़क सुरक्षा समिति की रिपोर्ट का अवलोकन कर सड़क के गड्ढों से बढ़ती मौतों पर केंद्र और राज्यों से जबाब मांगा है। अदालत ने गड्ढों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में बढ़ती मौतों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण एवं अन्य विभाग सडकों का ठीक से रखरखाव नहीं कर रहे हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार देश में 2013 से 2017 के दौरान गड्ढों की वजह से हुई सड़क दुर्घटनाओं में 14,926 लोगों की मौत हुई है। न्यायालय ने इस आंकड़े को सीमा पर आतंकवादी घटनाओं में मारे गए लोगों से भी अधिक बताया है। अदालत ने सड़क हादसों की वजह से तबाह होने वाले परिवारों को मुआवजा नहीं दिए जाने पर भी नाराजगी जताई है। एक रिपोर्ट के अनुसार इन हादसों के आधे से ज्यादा पीडि़त ऐसे होते हैं, जिन्हें पात्र होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिल पाता है। वर्ष 2014-15 के दौरान बीमा कंपनियों ने करीब 11,480 करोड़ का मुआवजा दिया, लेकिन आधे पीडि़तों को यह सुविधा नहीं मिल पाई। क्योंकि उन्हें इसके बारे में पता ही नहीं था।
इससे पहले 20 जुलाई को भी शीर्ष अदालत ने गड्ढों से होने वाली मौतों पर चिंता व्यक्त की थी। देश में बारिश आते ही घटिया निर्माण की वजह से आसपास की सड़कें जगह- जगह पर टूट जाती हैं और कुछ ही दिनों में एक गहरे गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं, लेकिन इसके बावजूद देश में लोग कष्ट सहकर गाडिय़ां चलाते रहते हैं। कभी किसी प्रशासनिक अधिकारी या नेता से इस बारे में सवाल नहीं पूछते हैं। इसीलिए तंत्र तमाशबीन हो जाता है। क्योंकि उसे पता है कि गड्ढों से होने वाली मौत की जिम्मेदारी उस पर कभी नहीं आएगी। यह उस भारत की सच्चाई है, जो विश्व गुरु बनने का सपना देखता है। महाशक्ति बनने के लिए भारत ने जो रास्ता बनाया है। उसमें गड्ढे ही गड्ढे हैं। आजादी के 70 साल बाद भी हमारा तंत्र, हमारा प्रशासन और अलग- अलग सरकारें देश के लोगों को अच्छी और सुरक्षित सड़क नहीं दे पाए। हमारा तंत्र सड़कों पर चलने वाले हर वाहन के लिए रोड टैक्स वसूलता है, लेकिन सुविधा के नाम पर लोगों के साथ लगातार धोखा किया जाता है। वर्ष 2016 में देश की सरकारों ने मोटर व्हीकल टैक्स और फीस के रूप में करीब 60,000 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया था। यह रकम देश में बेचे गए एक करोड़ सत्तर लाख वाहनों के टैक्स के रूप में मिली थी, लेकिन जन सुविधा देने की बारी आती है तो लोगों को बदले में गड्ढों वाली सड़कें और परेशान करने वाला लंबा ट्रैफिक जाम मिलता है।
जिस गति से देश में वाहनों की संख्या बढ़ रही है। उसकी तुलना में अच्छी सड़कों के निर्माण की गति काफी धीमी है। रोड टैक्स और टोल टैक्स लेने के बाद देश के तंत्र की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह लोगों को बेहतर और सुरक्षित सड़क उपलब्ध कराए, लेकिन अफसोस है कि ऐसा कभी नहीं होता है। गड्ढे वाली इन सड़कों को झेलने के अलावा लोगों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं बचता है। क्योंकि हमारा तंत्र और प्रशासन गड्ढों को लेकर गंभीर नहीं हैं। कोई भी गड्ढों की वजह से होने वाली मौतों की जिम्मेदारी नहीं लेता है। यह देश की सड़कों पर होने वाला ऐसा आतंकवाद है, जिसका कोई विरोध नहीं होता। इस पर कोई कार्यवाही नहीं होती है। हमारा लापरवाह तंत्र आराम से चाय पीते हुए दुर्घटनाओं के आंकड़े गिनता हुआ दिखाई देता है। पिछले चार वर्षों में गड्ढों की वजह से लगभग 40,000 सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें 15,000 लोगों की जान गई। यानी हर रोज सिर्फ आठ लोगों की मौत गड्ढों की वजह से होती है और हर वर्ष औसतन 4,000 लोगों की मौत गड्ढों की वजह से हो जाती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में 2,983 लोग खराब सड़कों की वजह से मारे गए। वहीं, 589 लोगों की सड़कों की खराब इंजीनियरिंग की वजह से और 1613 लोगों की सड़कों पर कम रोशनी की वजह से जान चली गई। कारगिल युद्ध में भारत के 527 जवान शहीद हुए थे। यानी एक युद्ध में जितने सैनिक मारे जाते हैं। उससे कई गुना ज्यादा लोग हमारे देश की सड़कों के गड्ढों की वजह से मारे जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारा तंत्र, देश के प्रशासन और अलग राज्यों की सरकारों की नींद कभी नहीं टूटती है।
ऐसे मामलों में इंजीनियर या सड़क बनाने वाले ठेकेदार पर कभी सवाल नहीं उठाए जाते हैं। उन पर कभी मुकदमे नहीं चलाए जाते हैं और किसी की मौत के लिए उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया जाता है। अक्सर देश में जब भी किसी सड़क दुर्घटना में किसी निर्दोष की जान जाती है तो उसे लोग बदकिस्मती मान लेते हैं। कहते हैं शायद ऊपर वाले को यही मंजूर था। लेकिन लोग ऐसी दुर्घटनाओं की असली वजह की तलाश कर समस्या की जड़ में नहीं जाते हैं। लोगों मे जागरूकता की कमी के कारण हमारे तंत्र की बड़ी- बड़ी लापरवाही छुप जाती हैं। मौत वाले गड्ढे देश के हर शहर की सड़कों पर दिखाई देते हैं और कुछ ही दिनों में सैकड़ों लोग इन गड्ढों की वजह से मारे जाते हैं। यह ऐसे लोग हैं जिनके मरने से न तो किसी नेता को कोई फर्क पड़ता है, न ही किसी अफसर को। देश में घटिया निर्माण कार्यों से होने वाली मौतों और दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है। लेकिन इन मौतों के लिए तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस मामले में भारत पडोसी देश चीन से शिक्षा ले सकता है। चीन ने अक्टूबर 2016 में घटिया निर्माण और पानी की सप्लाई से जुड़ी लापरवाही करने वाले 6000 अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी तरह मई 2017 में हांगकांग में निर्माण कार्य से जुड़ी कंक्रीट टेस्ट रिपोर्ट में गड़बड़ी करने के लिए 21 कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। जब तक देश में प्रशासन की जिम्मेदारी तय नहीं होगी और दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, तब तक देश को गड्ढों से मुक्ति नहीं मिलेगी। वहीं शहर की सिवरेज व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग मेनहॉल भी सड़क दुर्घटनाओं का महत्वपूर्ण कारण है। लेकिन देश की नगर निकाय अक्सर इनको ढकना ही भूल जाती हैं। यह मेनहॉल सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों और दुपहिया वाहन चलाने वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित होते हैं, लेकिन यहां गलती सिर्फ नगर निकायों की नहीं है। क्योंकि देश में लोग मेनहॉल के ढक्कन भी चुरा लेते हैं।
पूरी दुनियां में भारत और चीन ही ऐसे देश हैं, जहां मेनहॉल्स के ढक्कन चुराए जाने की ज्यादा घटनाएं होती हैं। देश में अक्सर मेनहॉल कवर को चुरा लिया जाता है और कई बार नगरपालिकाएं कवर लगाती भी नहीं है। इसकी वजह से सड़कों पर बड़ी संख्या में हादसे होते हैं। वहीं, अमेरिका में मेड इन इंडिया मेनहॉल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो मेनहॉल कवर भारत में विकृतियों के साथ सड़कों पर लगाए जाते हैं। देश में बने वही कवर अमेरिका जैसे देशों में कई वर्षों तक खराब नहीं होते हैं। दरअसल इसके लिए मेनहॉल के कवर की मजबूती के साथ- साथ तंत्र की मजबूत इच्छाशक्ति भी जिम्मेदार है। जिसका असर भारत की सड़कों पर हर जगह दिखता है। खराब सड़क और गड्ढों की दुर्घटनाओं के पीडि़तों को अलग से मुआवजा मिलना चाहिए। लोगों की जान लेने वाले घटिया तंत्र, ठेकेदार, सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सड़कों के निर्माण कार्य के कॉन्ट्रैक्ट में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है। जिसकी वजह से कार्य की गुणवत्ता खराब होती है और बाद में यही भ्रष्टाचार लोगों की जान ले लेता है। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा रोड एक्सिडेंट्स इन इंडिया रिपोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार देश में हर साल करीब पांच लाख सड़क हादसे होते हैं। जिनमें डेढ़ लाख लोग हर बर्ष अपनी जान गंवा देते हैं, लेकिन इन डेढ़ लाख लोगों के मारे जाने का सवाल कभी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता है। भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में सड़क हादसों ने 20457 तो केवल पैदल यात्रियों की ही जान ले ली। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मारे जाने वाले आधे लोगों में 15 से 35 आयु वर्ग के होते हैं।
अच्छी सड़कें और अच्छा ड्रेनेज सिस्टम मिलना देश के हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है और यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह लोगों को अच्छी सड़कें मुहैया कराए। देश में दुर्घटनाओं को अक्सर किस्मत से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम उन लोगों पर सवाल उठाएं जो असलियत में इन दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

                                        जागरूकता की कमी के कारण हमारे तंत्र की बड़ी- बड़ी लापरवाही छुप जाती हैं। मौत वाले गड्ढे देश के हर शहर की सड़कों पर दिखाई देते हैं और कुछ ही दिनों में सैकड़ों लोग इन गड्ढों की वजह से मारे जाते हैं। यह ऐसे लोग हैं जिनके मरने से न तो किसी नेता को कोई फर्क पड़ता है, न ही किसी अफसर को। देश में घटिया निर्माण कार्यों से होने वाली मौतों और दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है। लेकिन इन मौतों के लिए तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस मामले में भारत पडोसी देश चीन से शिक्षा ले सकता है। चीन ने अक्टूबर 2016 में घटिया निर्माण और पानी की सप्लाई से जुड़ी लापरवाही करने वाले 6000 अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसी तरह मई 2017 में हांगकांग में निर्माण कार्य से जुड़ी कंक्रीट टेस्ट रिपोर्ट में गड़बड़ी करने के लिए 21 कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया था। जब तक देश में प्रशासन की जिम्मेदारी तय नहीं होगी और दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, तब तक देश को गड्ढों से मुक्ति नहीं मिलेगी। वहीं शहर की सिवरेज व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग मेनहॉल भी सड़क दुर्घटनाओं का महत्वपूर्ण कारण है। लेकिन देश की नगर निकाय अक्सर इनको ढकना ही भूल जाती हैं। यह मेनहॉल सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों और दुपहिया वाहन चलाने वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित होते हैं, लेकिन यहां गलती सिर्फ नगर निकायों की नहीं है। क्योंकि देश में लोग मेनहॉल के ढक्कन भी चुरा लेते हैं। 
पूरी दुनियां में भारत और चीन ही ऐसे देश हैं, जहां मेनहॉल्स के ढक्कन चुराए जाने की ज्यादा घटनाएं होती हैं। देश में अक्सर मेनहॉल कवर को चुरा लिया जाता है और कई बार नगरपालिकाएं कवर लगाती भी नहीं है। इसकी वजह से सड़कों पर बड़ी संख्या में हादसे होते हैं। वहीं, अमेरिका में मेड इन इंडिया मेनहॉल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो मेनहॉल कवर भारत में विकृतियों के साथ सड़कों पर लगाए जाते हैं। देश में बने वही कवर अमेरिका जैसे देशों में कई वर्षों तक खराब नहीं होते हैं। दरअसल इसके लिए मेनहॉल के कवर की मजबूती के साथ- साथ तंत्र की मजबूत इच्छाशक्ति भी जिम्मेदार है। जिसका असर भारत की सड़कों पर हर जगह दिखता है। खराब सड़क और गड्ढों की दुर्घटनाओं के पीडि़तों को अलग से मुआवजा मिलना चाहिए। लोगों की जान लेने वाले घटिया तंत्र, ठेकेदार, सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों पर आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। 
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सड़कों के निर्माण कार्य के कॉन्ट्रैक्ट में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है। जिसकी वजह से कार्य की गुणवत्ता  खराब होती है और बाद में यही भ्रष्टाचार लोगों की जान ले लेता है। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा रोड एक्सिडेंट्स इन इंडिया रिपोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार देश में हर साल करीब पांच लाख सड़क हादसे होते हैं। जिनमें डेढ़ लाख लोग हर बर्ष अपनी जान गंवा देते हैं, लेकिन इन डेढ़ लाख लोगों के मारे जाने का सवाल कभी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता है। भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 में सड़क हादसों ने 20457 तो केवल पैदल यात्रियों की ही जान ले ली। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि मारे जाने वाले आधे लोगों में 15 से 35 आयु वर्ग के होते हैं। 
अच्छी सड़कें और अच्छा ड्रेनेज सिस्टम मिलना देश के हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है और यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह लोगों को अच्छी सड़कें मुहैया कराए। देश में दुर्घटनाओं को अक्सर किस्मत से जोड़कर देखते हैं, लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम उन लोगों पर सवाल उठाएं जो असलियत में इन दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। 
अश्विनी शर्मा 
अध्येता, काशी हिन्दू 
विश्वविद्यालय वाराणसी 

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