महाप्रज्ञ दर्शन का विशिष्ट ग्रंथ है अन्तर्यात्रा: एक योगी की -

महाप्रज्ञ दर्शन का विशिष्ट ग्रंथ है अन्तर्यात्रा: एक योगी की

डॉ. महेन्द्र कर्णावट द्वारा संपादित प्रस्तुत पुस्तक अन्तर्यात्रा: एक योगी की में महान दार्शनिक, चिंतक, साहित्यकार आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन दर्शन व घटना प्रसंग का सांगोपांग समावेश किया गया है। पुस्तक के शुरूआत में उनके उत्तराधिकारी आचार्य महाश्रमण, महाप्रज्ञ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते है- ‘‘महाप्रज्ञ का सीधा सा अर्थ है – महाविद्वान।’’ इसकी कुछ ओर व्याख्या की जाए तो कहा जा सकता है- ‘महती अस्ति प्रज्ञा चास्य स: महाप्रज्ञ:।’ जिसकी प्रज्ञा महान् होती है, वह महाप्रज्ञ होता है। आचार्य महाप्रज्ञ ने संतत्व की, ज्ञान की, संयम की विशिष्ट आराधना की। वे संत थे- महात्मा थे।’’ आचार्य महाप्रज्ञ देश-विदेश में अपनी विद्वत्ता, ज्ञान- कौशल व संतता के लिए सुप्रसिद्ध रहे हैं। उनके जीवन की अनेकानेक घटनाएं एवं प्रसंग रहे हैं। उन घटना प्रसंग व जीवन दर्शन को प्रामाणिकता के साथ एक सूत्र में पिरोना जटिल कार्य रहा है। संपादक डॉ. महेन्द्र कर्णावट ने इस पुस्तक में आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन-दर्शन को तथ्यात्मक व रोचक रूप से प्रस्तुत कर महाप्रज्ञ शताब्दी वर्ष में एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की सौगात दी है।
पुस्तक के आमुख में साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र शर्मा ‘कुसुम’ लिखते हैैं- ‘‘पुस्तक के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि लेखक अत्यन्त सहज भाव से अणुव्रत यात्रा की कहानी कहता हुआ आचार्य महाप्रज्ञ की अन्तर्यात्रा के विभिन्न पड़ावों से गुजरता हुआ आचार्यश्री के विलक्षण एवं व्युत्पन्न तथा भास्वर व्यक्तित्व एवं कृतित्व से हमें परिचित कराता चलता है। आचार्यवर की सर्वांगीण प्रतिभा से हम अभिभूत एवं विस्मित होते हैं।’’ डॉ. महेन्द्र कर्णावट पुस्तक संपादन का प्रसंग बताते हुए लिखते हैं- मेरे पिताश्री अणुव्रत महारथी देवेन्द्रकुमार कर्णावट की प्रबल उत्कंठा रही कि आचार्य महाप्रज्ञ की जीवन गाथा को अपनी लेखनी से उकेरें, लेकिन शारीरिक अस्वस्थता के कारण वे

महाप्रज्ञ गाथा का लेखन नहीं कर पाए। आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ की छत्र-छाया में देवेन्द्र काका ने जीवन के पचास वर्ष व्यतीत किए थे।
उन्होंने दोनों विभूतियों को निकट से देखा था। यह स्मृति आते ही लिखने का मन बना। यह विचार आते ही आचार्य महाप्रज्ञ से संबंधित साहित्य को पुन: पढऩा-देखना प्रारंभ किया और आचार्य महाप्रज्ञ की मुनि नथमल से महाप्रज्ञ की अन्तर्यात्रा से संबंधित प्रमुख घटनाक्रम को लेकर उन्हें पुस्तक का रूप दिया।
पुस्तक ‘अन्तर्यात्रा: एक योगी की’ को तीन खंडों में विभाजित किया गया है, जिसमें कालूयुग, तुलसी युग व महाप्रज्ञ युग के माध्यम से संयोजित किया गया है। पुस्तक में कुल 137 लेखों का समावेश सुन्दर रूप से किया गया है। आचार्य महाप्रज्ञ के जीवन से जुड़ी प्रत्येक घटना-प्रसंग को कुशल संपादन के साथ रोचकता व सरसता के साथ प्रस्तुत किया गया है। कालू युग की एक घटना जिसमें शिक्षागुरू मुनि तुलसी ने एक दिन मुनि नथमल (आचार्य महाप्रज्ञ) से पूछा- क्या तुम मेरे जैसे बनोगे? उत्तर में मुनि ने नथमल ने सहज भाव से कह दिया- मुझे क्या पता? आप बनाऐंगे तो बन जाऊंगा। उत्तर के साथ ही गुरु चरणों में पूर्ण समर्पित हो मुनि नथमल चल पड़े अपनी अन्तर्यात्रा पर। वे समझ चुके थे कि मूल्य इससे तय नहीं होता कि हम क्या हैं, यह इससे तय होता है कि हम स्वयं को क्या बनाने की क्षमता रखते हैं। इसी प्रकार अनेक रोचक घटना-प्रसंगों को पुस्तक में समाहित किया गया है।
चंूकि आचार्य तुलसी का युग बहुत लम्बा रहा, इस युग की घटनाएं व प्रसंग भी व्यापक हैं। 3 जुलाई 1955 की उज्जैन की घटना है। आचार्य तुलसी ने साधु-साध्वियों की गोष्ठी में कहा कि हम आगम- संपादन का बड़ा काम हाथ में ले रहे हैं। हमें गहरी निष्ठा और शक्ति के नियोजन से इस कार्य को सम्पन्न करना है। आगम संपादन का समग्र दायित्व मैं मुनि नथमल को सौंपता हूं। मुनि नथमल ने निर्देश मिलते ही ’आयारचूला’ का अनुवाद प्रारंभ कर आगम संपादन कार्य का श्रीगणेश किया। इस प्रकार की अनेक घटना प्रसंग अणुव्रत पाक्षिक का प्रकाशन, राजघाट पर मैत्री दिवस, विद्या नगरी काशी में विद्वत् परिषद् आदि का वर्णन किया गया है।
महाप्रज्ञ युग की घटनाओं में महाप्रज्ञ वर्णन करते हुए कहते हैं- अहमदाबाद की यात्रा के दौरान हमें साम्प्रदायिक हिंसा से ग्रस्त और संत्रस्त गांवों में जाने का अवसर मिला। हम एक एक ऐसे गांव में पहुंचे, जहां शीघ्र दंगा होने की प्रबल संभावना थी। दंगे के लिए आवश्यक साधन सामग्री जुटा ली गई थी। मात्र चिंगारी भडक़ने की देरी थी। हमने तत्काल उस गांव के हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों के प्रमुख लोगों को बुलाया। उनके साथ हमारी विस्तृत बातचीत हुई। हमने दोनों समुदायों को आमने-सामने बैठाकर कुछ बातें कहीं। लगभग आधा घंटा बाद हमें दोनों पक्षों की ओर से यह सूचना मिली कि अब दंगा नहीं होगा, अहिंसा प्रशिक्षण का कार्य शुरू होगा। दोनों समुदाय मिलकर इस कार्यक्रम को चलाएंगे।
संपादक डॉ. कर्णावट ने प्रत्येक घटना प्रसंग को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत कर पुस्तक की महत्ता को उजागर किया है। आचार्य महाप्रज्ञ के जन्म से लेकर महाप्रयाण की विभिन्न घटनाओं को सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में आचार्य महाप्रज्ञ और राष्ट्रपति कलाम का पारस्परिक संवाद, अणुव्रत निष्ठा पत्र, राष्ट्रव्यापी यात्राओं आदि का सुन्दर वर्णन किया गया है। पुस्तक के अंत में आचार्य महाप्रज्ञ की 245 पुस्तकों की सूची दी गई है, जो पुस्तक को शोध पुस्तक का स्वरूप प्रदान करती है। पुस्तक में संपादक का श्रम झलक रहा है। महाप्रज्ञ के जीवन से जुड़ी यह पहली पुस्तक है जिसमें एक साथ महाप्रज्ञ दर्शन को समाहित किया गया है। आवरण पृष्ठ पर आचार्य महाप्रज्ञ का सुन्दर चित्र आकर्षित करने वाला है। उत्कृष्ट स्तर के कागज पर सुन्दर छपाई पुस्तक को विशेष बनाती है। महाप्रज्ञ दर्शन को समझने के इच्छुक प्रत्येक जिज्ञासु पाठक के लिए यह पुस्तक पठनीय है। पुस्तक में कहीं भी मूल्य का उल्लेख नहीं किया गया है, जो पाठकों को अखरता है। सम्मान स्वरूप भी पुस्तक का मूल्य निर्धारित होता तो कृति की महत्ता और बढ़ जाती। कुल मिलाकर महाप्रज्ञ शताब्दी वर्ष में ऐसी महत्त्वपूर्ण कृति के सामने आने से आम पाठक सहित विद्वानों, शोधार्थियों को आचार्य महाप्रज्ञ दर्शन को समग्र रूप से समझने में आसानी हो सकेगी।
पुस्तक का नाम- अन्तर्यात्रा: एक योगी की
संपादक- डॉ. महेन्द्र कर्णावट
प्रकाशक-गांधी सेवा सदन, राजसमन्द (राज)
पृष्ठ संख्या-336, संस्करण-प्रथम

समीक्षक
डॉ. वीरेन्द्र भाटी ‘मंगल’

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