बिच्छूवाद

एक जगह भव्य पांडाल में श्रीमद् भागवत कथा चल रही थी। दिव्य मंचासीन पंडितजी आलौकिक ज्ञानामृत कलश भक्तों पर उड़ेल रहे थे। वे अपने कथन की ओरिजनलिटी के प्रूफ के लिए एक छोटी सी कथा सुनाने लगे कि भक्तों! एक भगवा भेषधारी सज्जन नदी में अंग प्रक्षालन की क्रिया संपन्न कर रहे थे। अकस्मात् उनकी दृष्टि अबाध सलिला तरंगों से संघर्ष करते हुए एक लघु कीट की ओर गई। सज्जन में सज्जनता स्फुरित हुई और उन्होंने अपनी हथेली पर उस आक्रांत जीव को शरण दे दी। कुछ क्षण तक तो वह कीट शांत पड़ा रहा था और जब वह आश्वस्त हो गया कि अब किसी भी प्रकार भय नहीं है, तो उसमें निज गुण जागरण हुआ और सज्जन महोदय के उपकारों को ताक पर रखकर उसके हाथ को काट खाया। वे सज्जन दर्द से बिलबिला उठे। 
महोदयजी का संतुलन डगमगाया और वह तुच्छ कीट फिर से धराशायी होकर छटपटाने लगा। उन महाशय की पीड़ा किंचित कम हुई तो उन्होंने विषजंतु को तड़पता देखा और पुन: दूसरे हाथ में ले लिया। संत लक्षण प्रकरण में बाबा तुलसीदास जी कहते हैं- 'संत हृदय नवनीत समानाÓ अर्थात् संतों का हृदय ताजे माखन की तरह होता है, जो थोड़ा सा ताप पाकर तरल हो जाता है। दुर्जन संत के पिघलने को अपनी दुर्जनता की सफलता या सज्जन की मूर्खता मान लेते हैं। उस कृतघ्न कीट ने सज्जन को तब तक काटना नहीं छोड़ा, जब तक उन्होंने उसे निकालकर फेंक नहीं दिया।
किनारे पर खड़े तमाशबीनों ने पूछा कि बाबा जी आप इस जीव को अपने को हानि पहुंचाकर बचाने में क्यों लगे थे? जितना आपने उसकी सुरक्षा में समय और श्रम का अपव्यय किया है। यदि उसका आधा भी गाय जैसे अहिंसक प्राणियों के उत्थान में लगाते, तो उनकी दीनता समाप्ति हो जाती और समाज को विषैले जंतुओं से मुक्ति मिल भी जाती। सज्जन जहरीली पीड़ा में भी मुस्कुरा कर बोले- आप लोग संकुचित तथा दूर दृष्टि दोष ग्रसित हो। इसलिए ऐसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न कर रहे हो। संकीर्णता के घेरे से बाहर निकलकर देखोगे, तो मेरी महानता के दर्शन कर पाओगे। लोगों की आंखें चौड़ी होकर कानों को छू लीं। 
महात्मा जी निरंतर बोल रहे थे- इसको बचाने के दो कारण हैं, पहला सर्व जीव समभाव एवं सुरक्षा करना मेरा संकल्प है और विषाक्त करना इसकी प्रकृति है। दोनों अपनी आदतों से विवश हैं। दूसरा कारण शायद आपकी अदूरदर्शी दृष्टि नहीं देख पाएं। भीड़तंत्र प्रधान समाज में कोई भी प्राणी तुच्छ या अनुपयोगी नहीं है। क्योंकि पता नहीं कल कौनसा जीव मुझे मठाधीश के सिंहासन तक पहुंचने में सहायक सिद्ध हो। इसलिए मैंने किसी की सुरक्षा में कोताही नहीं बरती है। यह तो लघु कीट है। मैंने तो अपनी आस्तीनों में भयंकर फुंफकारने वाले को भी शरण दे रखी है। पंडित जी इस दृष्टांत के माध्यम से बताना चाह रहे थे कि परोपकार अच्छे या बुरे को ध्यान में रख कर करना बिल्कुल गलत है।
यह कथा आप लोगों ने जरूरी सुनी होगी, तो कुछ चेंज नहीं लगी? यदि लगी तो आप धार्मिक और जागरूक पाठक है। अन्यथा अखबारी पाठक जो सुबह की संवेदनशील घटना को दिमाग हैंग होने के डर से शाम तक भूल जाते हैं।
यह दृष्टान्त आधुनिक भारतीय समाज पर एकदम फिट बैठता है। क्योंकि कुछ नमक हराम देश के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं। पूरी सुरक्षा भी दी गई है, लेकिन जब भी दांव पाते हैं, तो डंक मारने में रहम नहीं करते हैं। जिस पत्तल में खाते हैं, उसमें छेद करने से नहीं चूकते हैं। जब भारत मां अपने बहादुर सपूतों के क्षत विक्षत शवों को देखकर चित्कार करती है, तो इनको सुखानुभूति होती है। लचीले कानून और संवैधानिक आजादी की ओट का अनुचित लाभ लेकर मनमाना राग आलापते हैं। इनके कुकृत्य को राजनीतिक भाषा में अलगाववाद कहा जाता है, लेकिन वास्तव में देखा जाए, तो शीर्षक इनके कार्यों का प्रतिबिंब है। लोकतांत्रिक नदी के हाशिये पर खड़ी जनता ने गुहार लगाई, तो इनके सुरक्षा बंधनों में थोड़ी सी ढील दी गई, तो इनके तेवर की पतंग जमीन चूमने लगी और अगर बिल्कुल केयर न किया जाए, तो पूरी हेकड़ी छूमंतर हो जाएगी और शेर से सियार बन जाएंगे।

पीयूष कुमार द्विवेदी ‘पूतू
सहायक प्रोफेसर हिन्दी विभाग
जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय
चित्रकूट उत्तरप्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »