बंशी बजाओ नीरो

नीरो जी जो थे कोई पैदाइशी बंसीवादक नहीं थे। उन्होंने संगीत की क्लास भी नहीं की थी। हां, उन्हें बंसी बजाने का शौक था। रोम में जब भी आग लगती थी नीरो जी बंसी बजाते थे। बंसी के साथ बजता था करताल जो भक्तगण बजाते थे। वादन ससुर हो रहा है या असुर इससे नीरोजी को कोई वास्ता नहीं था। वास्तव में वह अपनी तान सुनते नहीं थे सुनने वाले केवल भक्तगण थे, जो वाह के अलावा कुछ बोलते नहीं थे। और कुछ बोलने वालों को चुप कराने का एक अलग विभाग था जो स्याही वगैरह से लैस रहता था और कहीं भी किसी को भी कूटने की कला में पारंगत था। कुल किस्सा कोताह यह कि नीरो जी के बंसी वादन में कतई व्यवधान नहीं होता था। रोम जब भी जलता नीरोजी बंसी बजाते। रोम को जलना था वह जलता रहता था। नीरो जी कूंज में बैठकर बंसी बजाते रहे।
दंगे हों, कत्लेआम हो, धर्म के नाम पर किसी को कूटा जाये उनके बंसीवादन में कोई फर्क नहीं पड़ता था। श्रद्धालु इसका अर्थ यह न समझें कि नीरोजी को प्रजा से प्यार नहीं था। उन्हें था तभी तो अपने मन की बात प्रजा तक पहुंचाने के लिए एक विभाग खोल रखा था, जिसमें नाना प्रकार के अधिवक्ता और प्रवक्ता पाए जाते थे। वे राजा के मन की बात प्रजा को बताते थे। राजा भी झरोखा दर्शन के माध्यम से प्रजा के हालचाल जान लिया करता था। राजा जब भी भावुक होता था, तो अपने बचपन की कथाएं सुनाता था। उन्हीं की जुबानी लोगों को ज्ञात हुआ कि नीरो जी बचपन में बिल्कुल बच्चे थे। बेचारे चल भी नहीं पाते थे। बोल भी नहीं पाते थे। कितने कठिन दिन थे। भूख लगने पर नीप्पल से दूध पीना यानी अपने हाथ भी नहीं चलते थे। महीनों तक तो नंगे घूमे। किसी ने कच्छा पहना दिया तो पहन लिया, नहीं तो नंगे रह लिया। छ: महीने तक तो दूध के अलावा कोई आहार नहीं लिया। बचपन से ही त्यागी प्रवृति के थे। उसके बाद भी दलिया, खिचड़ी और जौ के हलुआ पर दिन कटे। कितने बेवश थे नीरो जी।
बचपन के दिनों को याद करके नीरो जी आज भी भावुक हो जाते हैं। उन्हें मां की याद बहुत आती है। मां उनके नाक पोंछ दिया करती थी। विरोधी तो चाहते ही थे कि बहती रहे। नीरो जी जब अत्यधिक भावुक हो जाते थे तो बंसी बजाने चले जाते थे। बंसी वादन में उन्हें सबसे ज्यादा जो बात अच्छी लगती थी वह थी उंगलियों के इशारे पर स्वर का बदल जाना। उंगलियों के इशारे पर ही वह सबके सुर बदल दिया करते थे।
एक बार की कथा है कि उनके राज्य में लेखकों और कलाकारों को पीड़ा होने लगी। पीड़ा के कारणों का ठीक-ठीक ज्ञान तो नहीं था, लेकिन सबके पेट में अलग-अलग प्रकार का दर्द था। किसी को राजा से शूल था, तो किसी को उनके वादन से उदरपीड़ा थी। किसी को उनके मन की बात पेट में चुभ रही थी, तो किसी को उनके कूंज में बैठने की शैली पसंद नहीं थी। एक बात तय थी कि सबके पेट में दर्द था। पेट दर्द के नाम पर लेखकों ने तय किया कि अपनी कलम राजा को सौंप देंगे। लेखक राजा के भक्त विभाग में पहुंचे तो पता चला कि साहब बंसी बजाने गए हैं। कब तक लौंटेंग पता नहीं। लेखक निराश नहीं होते। उन्होंने विभाग में ही कलम जमा करा दी और कहा कि हमारा विरोध हो गया। विभाग का किरानी जो अंतिम बार आठवीं में स्कूल गया था, उसने कलम से विरोध की यह तकनीक पहली बार देखी थी तो हंसने लगा। उसको हंसता देख लेखक और कलाकार आहत हो गए। आहत होना साहित्यकारों का जन्मसिद्ध अधिकार है। इससे उन्हें कोई रोक नहीं सकता। उनके आहत होते ही कलाकारों ने कूची वापस कर दी। फिल्म वालों ने कैमरे लाकर पटक दिए। एक वैज्ञानिक भी भटकता हुआ आया और अपनी सूक्ष्मदर्शी यंत्र रखकर चला गया। भक्तों ने जाकर देखा कि नीरो साहब क्या कर रहे हैं, तो वे आंखें बंद करके पद्मासन का अभ्यास कर रहे थे। योगी आदमी थे। भक्तों ने तंग करना उचित नहीं समझा। इंतजार करते रहे। नीरो जी जब तक बंसी बजा रहे थे, तब तक देश को अधिवक्ता और प्रवक्ता चला रहे थे। वही नीरो जी को देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सलाह दे दिया करते थे।
नीरोजी दिनभर बंसी बजाकर शाम को फेसबुक और ट्विटर पर अपने मन की बात लिखा करते थे। संसार भर की खबर लिया करते थे। उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाकर एक दिन कहा-
‘मैं सोच रहा हूं कि बुद्धिजीवियों को बुलाकर बात कर लूं। उनकी समस्या क्या है, समझने की कोशिश कर लूं। यदि वे कह रहे हैं कि हमारे राज्य में सहनशीलता की कमी है तो कहां है? कहां से आएगी ? इन बातों के लिए एक बार बात करनी चाहिए।’
मंत्री मुस्कराने लगे। एक ने अदब से झुककर कहा-
‘हुजूर! आप संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे अधिक मतों से चुने गए राजा हैं। इन तुच्छ बुद्धिजीवियों से बात करके आप इनको सिर पर चढ़ाएंगे। इन्होंने आपके खिलाफ हमेशा आग उगली है। आपके राज्य में जब दंगा हुआ, तो यही लोग जनता को आपके खिलाफ भडक़ाते रहे। ये लोग कभी दूसरे राजाओं के खिलाफ इतना नहीं बोले, जितना हुजूर के खिलाफ। आप मजे से बंसी बजाएं। बात तो हम कर लेंगे। ऐसा कर लेंगे कि ससुर याद रखेंगे। सहनशीलता तो इन्हें हम सिखाएंगे ही।’
नीरो जी का मन प्रसन्न हो गया। बंसी बजाने लगे। उन्हें दुनिया की चिंता होती तो दुनिया के दौरे पर चले जाते। उनके मंत्री कहते भी थे- ‘हुजूर! आप दुनिया की चिंता करें। देश के लिए तो हम हैं ही। आप बड़े हैं, बड़ी समस्याएं सुलझाएं।’
बुद्धिजीवियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए मंत्रिगणों की सलाह पर दो-तीन बयानवीर मैदान में उतारे गए, जिनका काम था मीडिया के सवालों पर उल्टे-सीधे बयान देना, ताकि राज्य का ध्यान लेखकों की ओर से हटकर उनकी ओर आ जाए। हो भी रहा था। सधे हुए बयानवीर थे। आदमी की तुलना कभी कुत्तों से तो कभी सुअरों से करके सुर्खियां बटोर रहे थे।
मजे में थी मीडिया। उनको अपनी इच्छा के मुताबिक बयान मिल जाते थे, जिन्हें दिनभर दिखाकर वे टीआरपी की लूट कर रहे थे। सबका साथ सबका विकास हो ही रहा था कि महंगाई बढऩे लगी। महंगाई से तो बड़े-बड़े योद्धा चिंतित हो जाते हैं। नीरो जी बंसी बजाते रहे। वही महंगाई जो उनके पहले के राज-राजवाड़ों को निगल गई, नीरो जी की बंसी वादन पर फर्क नहीं डाल सकी। दाल ने काफी लंबी छलांग लगाई। तेल तो बांध तोडक़र बहने लगी। प्याज ने सबकी आंखों में आंसू ला दिए, लेकिन नीरो जी बंसी बजाते रहे। वित्तमंत्री आर्थिक मामलों को छोडक़र राजा के नंबर दो होने की होड़ में कूद चुके थे। कानून मंत्री का काम कानून के अलावा सबकुछ देखना था। कानून तो राज्य सरकारों की जिम्मेवारी होती है। इसमें देखने वाली कोई बात होती नहीं है। उनका अधिक समय इन बातों पर ध्यान देने में जा रहा था कि नीरो जी को बंसी वादन के बाद जो प्रिय है, वह उपस्थिति किया जाए। गृहमंत्री नीरो जी की बंसी के प्रबंध में ही सारा समय दे रहे थे। लिहाजा अंदर की व्यवस्था गड़बड़ थी, जिसकी ओर बुद्धिजीवियों ने ध्यान खींचने की कोशिश की थी। मसलन सारा कैबिनेट नीरो जी की प्रसन्नता के मसाले खोजने में लगा था। सबका ध्यान इस ओर था कि बंसी लगातार बजती रहे।
एक बार महंगाई की अधिक चर्चा से तंग आकर नीरो जी ने मीटिंग बुलाई। उवाचे-
मंत्रीगण! ‘हम दाल की महंगाई कम करना चाहते हैं। दाल और तेल महंगा होगा, तो आम आदमी खाएगा क्या?’
राजन्! ‘आम आदमी क्या खाएगा, यह तो हम नहीं बता सकते, लेकिन क्या नहीं खाने देंगे। इसकी लिस्ट है हमारे पास। यदि आपकी आज्ञा हो तो जनहित में जारी कर दें।’
‘सब कुछ हमसे पूछकर ही करोगे। अपनी अक्ल भी लगा लिया करो। हां, तो हम महंगाई कम करने के उपाय पूछ रहे थे। सरकार यानी कि हम क्या कर सकते हैं ?’
‘हम इसमें कुछ नहीं कर सकते, राजन! इस वर्ष वर्षा हुई बहुत कम। फसल मारी गई, तो उसमें राजा क्या कर सकता है? खाद्यान्नों के लिए वर्षा जरूरी है। हम वर्षा तो करा नहीं सकते।’
समवेत स्वर में ठहाका गूंजा।
मंत्रियों को हंसता-खेलता देखा राजा को विश्वास हो गया कि राज में अमन चैन है। उनका मन फिर बंसी बजाने का होने लगा। मन की उमंगों को राज्यहित में रोककर उन्होंने अगला प्रश्न किया – ‘हम कालाबाजारियों और आढ़तियों पर सख्ती कर सकते हैं। उनको रोक सकते हैं।’
हजूर! ‘यह काम राज्य का हैं। उसको ही यह काम करने देना चाहिए। नहीं तो एक बार फिर से मीडिया वाले आपको बदनाम करने लगेंगे कि संघीय व्यवस्था को समाप्त किया जा रहा है। महंगाई अपने आप जाएगी। आप चिंता न करें। यदि हो सके तो अपील कर दें। अपील करने से भी बुराइयां खत्म होती हैं। आपने सफाई के लिए लोगों से अपील की। आज देश के किसी भी कोने में एक तिनका नहीं मिलता। यहां तक कि चिडिय़ा भी घोंसला बनाते समय तिनका नहीं गिराती। आपने अपील की कि गरीब अपने बैंक खाते खुलवा लें, तो लोगों ने खुलवा लिए केवल धन की प्रतीक्षा में हैं, जो उसमें डालना है। आप पर लोगों का भरोसा है। आपने जिस काले धन को वापस लाने की बात की थी, लोग आज भी उसकी बाट जोह रहे हैं। आपने अपील की कि लोग अपनी गैस सब्सिडी छोड़ दें, लोगों ने छोड़ दी। आप धन्य हैं महाराज। आप बंसी बजाइए।’
महान तो हम हैं। महंगाई के खिलाफ कुछ न कुछ तो करना ही होगा। चलो ठीक है, हम महंगाई पर मन की बात करेंगे। किसानों से अपील करेंगे कि अधिक से अधिक प्याज, दाल और सरसो की खेती करें। देशहित में खेती करें। वर्षा नहीं हुई तो नहीं हुई। वर्षा से बड़ा है देश। डर इस बात का है कि चुनावों में कहीं हमारे विरोधियों ने इसे ही मुद्दा बना लिया तो…। नहीं स्वामी! हम चुनावों में यह मुद्दा हर्गिज नहीं बनने देंगे। मुद्दा तो हम विरोधियों को देंगे। हम जिस चीज पर चाहेंगे, बहस उसी पर होगी। आप कहें तो हम धर्म-कर्म पर बहस को ले जाएं।
सब काम हमसे पूछ कर ही करोगे। अपनी अक्ल भी लगा लिया करो। हम धार्मिक व्यक्ति हैं। धर्म पर बहस होगी, तो पाप कटेंगे। सांसारिक आवागमन से मुक्ति मिलेगी। एक मंत्री अपेक्षाकृत युवा होने के कारण गलत बात कह बैठा- ‘कहीं सत्ता में आवागमन से मुक्ति मिल गई तो…।’ नीरो जी त्यारियां चढ़ गईं। साफ लग रहा था कि युवा मंत्री का विभाग इस परिवत्र्तन में जाएगा। उन्होंने अपना गुस्सा पीकर हरिओम कहा और बोले- ‘यह एक आजमया गया नुस्खा है। कभी विफल नहीं होता। माहौल बनाओ कि सारी बहस महंगाई की बजाय धर्म पर होने लगे।’ समवेत स्वर में सभी मंत्रियों ने कहा- जो आज्ञा स्वामी! नीरो जी बंसी बजाने चले गए।

शशिकांत सिंह ‘शशि’
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर
नांदेड़ (महाराष्ट्र)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »