निजी स्कूलों की चांदी, सोया पड़ा शिक्षा विभाग

  • हर वर्ष फीस बढ़ाते है निजी स्कूल
  • ड्रेस, किताबों को बेचने का धंधा बनाया
  • कमीशन की साठ-गाँठ से अभिभावकों से ठगी

एक सफल इंसान की सफलता में उसके परिवार, समाज और मित्रों के साथ शिक्षा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। इसलिए शिक्षा से जुडी उसकी नींव मजबूत होनी चाहिए और नींव को मजबूत करने के लिए जरूरत होती है एक सफल शिक्षक की। प्राचीन समय में छात्र अपने आवास को छोडकर गुरूकु ल में शिक्षा प्राप्त करने जाते थे। जहां गुरू बिना लालच के अपने शिष्यों को जीवन में सफल होने का मूलमंत्र प्रदान करते थे। गुरू और शिष्य का यह पावन रिश्ता इसलिए महत्वपूर्ण कहलाता था कि उसमें किसी भी प्रकार का लोभ और लालच की भावना लेस मात्र नहीं थी। गुरू की आज्ञा ही शिष्यों के लिए महत्वपूर्ण आदेश होता था। परन्तु आज की शिक्षा एक व्यवसाय सा बन गई है। पहले गुरूओं द्वारा शिक्षा एक निश्चल भाव से बिना किसी मांग के अपने ज्ञान की वर्षा शिष्यों पर करते थे। लेकिन आज के दौर में निजी स्कूलों ने शिक्षा को एक व्यवसाय बना डाला है। इन निजी स्कूलों के द्वारा शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को लूटने का कार्य किया जाता है। आज जितना लाभ शिक्षा के क्षेत्र में है उतना कही ओर नहीं। यहीं कारण है कि निजी विद्यालयों मेें धन कमाने की होड लगी है और बात धन कमाने की हो तो शिक्षा को तो ताक पर रख दिया जाता है। व्यवसाय की शिक्षा देने वाले यह विद्यालय छात्रों के अभिभावकों के साथ व्यवसाय ही करने लगे है।
जिले के सभी विद्यालय अपने नये सत्र की शुरूआत करने में जुट गए है और नया सत्र तो निजी विद्यालय के लिए एक स्वर्णिम समय होता है क्योंकि इस दौरान निजी विद्यालयों पर चांदी ही चांदी बरसती है। इस दौरान विद्यालय प्रबंधन कमर कस के अभिभावकों की जेब ढीली करने पर जुटे रहते है तो अभिभावक भी इनके मायाजाली नियमों में लूटने को तैयार रहते है। सीबीएसई मान्यता प्राप्त विद्यालय हो या अन्य निजी विद्यालय जहां नए शैक्षिक सत्र शुरू होने से पहले ही अभिभावकों को बच्चों का नामांकन, पाठ्यपुस्तक, स्टेशनरी, डे्रस आदि की खरीददारी की चिंता सताने लगती है।
जिले के अधिकांश निजी स्कूलों के निजी नियमों के कारण अभिभावकों को लूटा जा रहा है। पुस्तकों की खरीदारी से लेकर फीस वसूली तक लूट मची है। सरकार व प्रशासन द्वारा इस पर किसी स्तर से निगरानी व नियंत्रण नहीं रहने के कारण अभिभावकों का आर्थिक दोहन जारी है। स्कूल प्रशासन निजी प्रकाशन की किताबे महंगी कीमत पर बेचते है। मजबूरी में अभिभावकों को भी इन किताबों को खरीदने के लिए विवश होना पडता हैं। जानकारी के अनुसार निजी प्रकाशकों के एजेंट द्वारा विद्यालय संचालकों को इसके लिए 25 से 30 फीसदी तक का कमीशन दिया जाता है। यही कारण है कि विद्यालय संचालक अधिक कमीशन देने वाले निजी प्रकाशकों की ही किताबों की बिक्री स्वयं अपने संरक्षण में कराते हैं। जिला मुख्यालय सहित जिले भर में निजी विद्यालयों में इन दिनों कॉपी-किताबों की दुकानें खुल गई है। जहां विद्यालय प्राचार्य एवं संचालक अभिभावकों को उनके द्वारा तैयार किताबों की सूची थमाकर विद्यालय से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं। इतना ही नहीं शहर में कई दुकानें खुली हुई है जहां सभी निजी प्रकाशन की किताबें उपलब्ध है। जानकारी के अनुसार कुछ दुकानदारों द्वारा भी विद्यालय संचालकों को कमीशन तय कर उनके दुकान से ही किताब लेने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाते हैं। जानकार बताते हैं कि एनसीईआरटी की किताबों के अनुपात में निजी प्रकाशन की किताब की कीमत 10 से 20 फीसदी अधिक होती है। कक्षा प्रथम से नौवीं कक्षा की किताब व स्टेशनरी सामान के खरीदने में दो से पांच हजार रुपये तक खर्च करने पडते हैं। किताबों पर प्रत्येक वर्ष वृद्धि कीमत का स्टीकर साटकर अभिभावकों को ठगा जा रहा है। निजी विद्यालयों द्वारा प्रत्येक नए शिक्षण सत्र में अभिभावकों लूटने का सिलसिला निरंतर जारी है लेकिन शिक्षा विभाग द्वारा इन पर कार्रवाई को लेकर अनदेखा किया जाता है।
क्या कहते है नियम
जिले में संचालित निजी शिक्षण संस्थाओं के संचालकों की मनमानी एवं मनचाही वसूली जाने वाली शिक्षण शुल्क के बारे में जिला प्रशासन को हर साल मिलने वाली शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए इस बार ऐसी शिक्षण संस्थाओं के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करनी चाहिए और साथ ही अतिरिक्त निदेशक, बीकानेर से मिले आदेशों के तहत सभी शिक्षण संस्थाओं के संचालकों को शर्तों एवं नियमों का हवाला देते हुए इनका कठोरता से पालन करने के निर्देश दिए जाने चाहिए।
राजस्थान शिक्षा विभाग के क्रमांक शिविरा-मा/मा/अ-3/फीस का विनिमय/2016-17/2017 दिनांक 10 नवम्बर 2017 को समस्त जिला शिक्षा अधिकारी माध्यमिक शिक्षा प्रथम/द्वितीय को राजस्थान विद्यालय (फीस का विनिमय) अधिनियम 2016 दिनांक 1 जुलाई 2016 से लागू किया गया तथा राजस्थान विद्यालय (फीस का विनिमय) नियम 2017 दिनांक 14 फरवरी 2017 को लागू किऐ गये है। अधिनियम की धारा-4 (ख) के अनुसार विद्यालय के मुखिया द्वारा प्रत्येक शैक्षिणिक वर्ष के आरम्भ केे 30 दिवस के भीतर-भीतर माता-पिता अध्यापक संगम का गठन किया जाना है। अधिनियम की धारा 4 ग के अनुसार माता-पिता अध्यापक संगम का गठन हो जाने के पश्चात विद्यालस स्तरीय फीस समिति का गठन किया जाएगा। अधिनियम की धारा-6(2)के अनुसार विद्यालय स्तरीय फीस समिति के गठन पर प्रबंध आगामी शैक्षणिक वर्ष के प्रारम्भ से कम से कम 6 माह पूर्व प्रस्तावित फीस विद्यालय स्तरीय फीस समिति को अनुमोदन हेतु प्रस्तुत करेगा। अधिनियम की धारा-6(4)में वर्णित प्रावधान के अनुसार विद्यालय स्तरीय फीस समिति द्वारा प्रस्तावित फीस का अनुमोदन किया जाएगा।
गैर सरकारी विद्यालय फीस का विनियमन, 2016 के अध्याय 5 के अनुसार कोई भी गैर सरकारी स्कूल अधिनियमन के अधीन नियत और अनुमोदित फीस से अधिक कोई फीस संग्रहित नहीं करेगा। प्रत्येक गैर सरकारी विद्यालय के अभिभावकों अध्यापकों को इस कमेटी में शामिल करेगा।
इसमें अध्यक्ष विद्यालय प्रबंधक का प्रतिनिधि होगा। निजी विद्यालयों का प्रधानाचार्य सचिव होगा तथा 3 अध्यापक व 5 अभिभावक सदस्य होंगे। विद्यालय स्तरीय फीस समिति के सदस्यों की सूची विद्यालय स्तरीय फीस समिति के गठन से 15 दिवस के भीतर नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित की जाएगी। इसकी प्रति जिला शिक्षा अधिकारी को भेजी जाएगी। फीस समिति के सदस्य अभिभावकों में लॉटरी के माध्यम से तय किए जाएंगे। इसके तीन माह में एक बैठक होगी। इस कमेटी के विवाद की स्थिति में 10 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढाई जा सकेगी।
सभी निजी विद्यालयों में उक्त एक्ट के अनुसार माता-पिता एवं अध्यापक संगम गठित करते हुए विद्यालय स्तरीय बोर्ड पर चस्पा करते हुए, जिला शिक्षा अधिकारी को प्रति उपलब्ध करानी है एवं प्राईवेट स्कूल पोर्टल पर अपलोड करनी है। लेकिन ऐसा एक भी निजी विद्यालय द्वारा किया नहीं जाता है वहीं स्थानीय शिक्षा विभाग भी कार्रवाही करने में उदासीनता बरत रहा है। जिसके कारण निजी स्कूलों के हौसले बुलंदियों को छू रहे है।
इसके अलावा सभी निजी विद्यालयों को अपने विवेकानुसार, एनसीआरटी या राजस्थान राज्य पाठ्य पुस्तक मंडल एवं माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अथवा निजी प्रकाशकों द्वारा पाठ्यक्रम के अनुसार चयन कर सकेंगी परन्तु उनके लिए यह अनिवार्य होगा कि वे शिक्षण सत्र आरंभ होने के कम से कम एक माह पूर्व पुस्तकों की सूची, लेखक एवं प्रकाशक के नाम, मूल्य के साथ अपने विद्यालय के सूचना पट्ट (नोटिस बोर्ड) एवं अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करें।
निजी विद्यालयों को स्कूल के विद्यार्थियों या अपने अभिभावकों द्वारा मांगे जाने पर यह सूची उन्हें उपलब्ध करानी होगी ताकि विद्यार्थी या अभिभावकगण इन पुस्तकों के अलावा यूनिफार्म, टाई, जूते, कापियां आदि खुले बाजार से क्रय करने लिए स्वतंत्र होंगे उन पर किसी भी प्रकार दबाव नहीं होगा। प्रदेश में संचालित सभी निजी विद्यालयों (कक्षा एक से 12, एक से 8, एक से 5)चाहे किसी भी शिक्षा बोर्ड या मंडल से संबद्ध हो, यह नियम उन पर प्रभावी होंगे। राज्य सरकार द्वारा निजी विद्यालय के लिए जारी इन निर्देशो की पालना नहीं करने पर विद्यालय की मान्यता समाप्त करनेे की कार्रवाई की जाएगी। निजी विद्यालयों में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम अनुसार ही अध्ययन कराया जाएगा। अपनी मर्जी से स्कूल कोई पाठ्यक्रम निर्धारित नहीं करेगा। पाठ्यक्रम के साथ साथ ज्ञानवर्धक पुस्तक यदि चलाना चाहते हैं तो जिला शिक्षा अधिकारी से अनुमोदन कराना आवश्यक होगा।
कुम्भकर्णी नींद में शिक्षा विभाग
शिक्षा विभाग बीकानेर द्वारा पत्र क्रमांकशिविरा/प्रार/पीएसपी/ए/
मूलमान्यता/19654/2018-19/लूज-1 दिनांक 26 मार्च 2019 को निजी विद्यालयो में पुस्तकें, यूनिफार्म, जूते, टाई आदि के सम्बधित प्रत्येक जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों को प्रदेश में संचालित निजी विद्यालयों के संबंध में राज्य सरकार से जनहित में दिशा-निर्देश की अनुपालना में पत्र भेजा था। जिसमें निर्देश जारी किए है कि निजी विद्यालय द्वारा पुस्तकों, यूनिफार्म, जूते, टाई आदि के नाम पर भारी रकम वसूल की जाती है या दुकानदार विशेष से यह सामग्री खरीदने हेतु निर्देश प्रदान किए जाते है। इस कारण यह सामग्री प्रतिस्पर्धी मूल्य पर प्राप्त नहीं होती। इस सम्बध मेें जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देशित किया है कि इस सम्बंध में निजी विद्यालयों द्वारा मनमानी नहीं हो, ऐसी व्यवस्था की जावें। वही इस आदेश की पालना को सख्ती से सुनिश्चित की जावें। लेकिन सिरोही के जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में इस पत्र से सम्बधित उदासीनता बरती गई। जब इस पत्र के बारे में सिरोही मिरर ने सिरोही की कुछ निजी विद्यालयों से बात की तो उन्होंने बताया यह पत्र तो हमें मिला ही नहीं। इस पत्र के सम्बंध मेें सिरोही मिरर के द्वारा सीडीओ लक्ष्मी को अवगत कराया तो उन्होनें कहा कि ‘नोटिस बोर्ड पर फीस और किताबों को चस्पाने के निर्देश तो दिए हुए है लेकिन अभी खबर मत छापना, मैं पुन: आदेश निकलवाती हूंÓ। राज्य सरकार द्वारा 26 मार्च 2019 को भेजे गए पत्र के संदर्भ में सीडीओ ने सिरोही मिरर के द्वारा ध्यान में लाने के बाद सभी शिक्षा अधिकारीयों को उनके द्वारा सूचना भेजीे गयी। क्या यह शिक्षा विभाग की लापरवाही है या कार्य के प्रति उदासीनता।
नियमों की उड रही है धज्जियां, निजी विद्यालयों का तानाशाही शासन
शिक्षा विभाग राजस्थान द्वारा जारी नियमों की अवहेलना तो कोई इन निजी विद्यालयों से सीखे। जब इसके बारे में सिरोही मिरर की टीम ने आबूरोड स्थित तीन स्कूलों की जांच की तो तीनों स्कूलो में सालाना फीस निर्धारण सम्बन्धित भारी अनियमिता पाई गई।
सेन्ट एन्सलम स्कूल, आबूरोड़
आबूरोड की सेन्ट एन्सलम स्कूल में जांच की तो वहां पर नोटिस बोर्ड पर फीस सम्बधित कोई भी सूचना उपलब्ध नहीं थी। केवल बुक का नाम और प्रकाशक की सूचना अंकित थी। यहां पर कक्षा प्रथम की सालाना (9 माह) फीस 21600/-, प्रवेश शुल्क 3000/- व फार्म फीस 300/- सहित कुल 24900/- बस फीस को छोडकर बताई गई।
साई बाबा स्कूल, आबूरोड़
आबूरोड़ स्थित साई बाबा स्कूल में भी नोटिस बोर्ड पर फीस से जुडी या बुक और प्रकाशक जुडी कोई भी सूचना अंकित नहीं थी। यहां पर कक्षा प्रथम की वार्षिक शुल्क (10माह)11300/-, प्रवेश शुृल्क
2500/- व फार्म शुल्क 150/- सहित 13950 रूपये बस फीस को छोडकर बताई गई। वहीं एक मुश्त में फीस जमा कराने पर डिस्काउंट का लालच भी दे रहे है।
रॉयल राजस्थान स्कूल, आबूरोड़
आबूरोड़ स्थित तीसरी स्कूल रॉयल राजस्थान की जांच की गई तो पाया कि स्कूली सूचना पट्ट पर कोई भी सूचना अंकित नहीं थी। वहां के प्रिंसिपल ने बताया कि कक्षा प्रथम की सालाना (10 माह) फीस 27600/-, प्रवेश शुल्क 3000/- व फार्म फीस 200/- व रजिस्ट्रेशन फीस 300/- सहित 31300 रूपये बस फीस को छोडकर बताई गई।
यहां पर भी एक मुश्त में सालाना फीस जमा करने पर एक हजार का डिस्कांउट ऑफर किया गया। किताबें खरीदने हेतु तुषार बुक स्टोर आबूरोड़ का नाम बताया गया। एक ही शहर में तीन विभिन्न स्कूलों की एक ही कक्षा की वार्षिक फीस में इतनी बडी असमानता शिक्षा विभाग के नियमों की धज्जियां उडा रहा है। नियमानुसार तो कक्षा प्रथम की फीस सभी विद्यालयों में एक जैसी होनी चाहिए, लेकिन बच्चों को दी जाने वाली सुविधा के अनुसार ही यह निजी विद्यालय अपने मनमाफिक फीस को तय करते है।
अभिभावकों पर बढती फीस की मार
निजी विद्यालयों द्वारा शिक्षा विभाग के नियमों को उल्लंघन करना अब आम बात हो गई है। अभिभावकों को फीस से लेकर पुस्तकों, डे्रस, जूते से सम्बधित जानकारी नोटिस बोर्ड पर ना अंकित कर उन्हें अंधेरे में रखा जा रहा है। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से ना के बराबर कार्रवाई करना निजी स्कूलों को ऐसा कृत्य करने के लिए ओर भी प्रेरित करता है। शिक्षा विभाग को तो जब तक कोई शिकायत ना मिले, तब तक यह कार्रवाई नहीं करते। जिला शिक्षा विभाग अपने स्वंय के विवेक से अपने स्तर पर कोई भी कार्रवाई नहीं करते है इसलिए इनके द्वारा निजी विद्यालयों पर उचित कार्रवाई के अभाव में ही अभिभावकगण पीसते जा रहे है और निजी विद्यालयों का निजी व्यवसाय आराम से फल-फूल रहा है।


सेन्ट एन्सलम स्कूल, आबूरोड़

साई बाबा स्कूल, आबूरोड़


रॉयल राजस्थान स्कूल, आबूरोड़

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