नरेन्द्र मोदी बनाम महागठबंधन

चुनावी रण 2019:-

एक ऐसी रणनीति जो 2019 के महाचुनाव की महागाथा को महासमर बनाएगी। मतलब मोदी सरकार के विरोध में अन्य पार्टियो ने एकजुटता दिखाते हुए महागठबंधन बना लिया है, जो 2019 के लोकसभा चुनाव के परिणाम को जनता के सामने महाजीत के परिणाम को पेश करेगा।
देश में हो रहे आगामी लोकसभा चुनाव में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू के परिणाम ही देश के भावी प्रधानमंत्री की दिशा तय करेंगे। लेकिन मोदी के विरूद्ध इन सभी राज्यों अलग-अलग पार्टियों ने अपना -अपना गठबंधन मोदी सरकार के खिलाफ बना लिया है।
राजस्थान के विधानसभा के चुनाव परिणाम में कांगे्रस ने बाजी मार ली, लेकिन स्थानीय स्तर पर पाली, जालोर और सिरोही में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। जहां जालोर, सिरोही और पाली में कांग्रेस ने अपने खाते में महज एक सीट को अपनी ओर खींचने में कामयाब हो पाया। वहीं सिरोही में तो कांगे्रस प्रत्याशी अपनी जमानत भी बचा नहीं पाएं। राजनीति का ऐसा ही खेल देश की जनता को जल्द ही आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा, जिसमेें मोदी सरकार के विरोध में विपक्षी दलो ने महागठबंधन चुनावों के नतीजो को बदलने का प्रयास करेंगे। यह गठबंधन इसलिए नहीं है। क्योंकि ज़्यादातर राज्यों में ये दल मिलकर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन इसे नाम दिया जा रहा है महागठबंधन का। यह दरअसल उन क्षेत्रीय दलों का एक समूह है जो 2019 में बीजेपी को बहुमत न मिलने की हालत में साझा सरकार बनाने की जुगत में है, यानी अगर कोई गठबंधन हुआ तो वो चुनाव नतीजे आने के बाद होगा।
जिसकी जितनी ताकत, सत्ता में उसकी उतनी हिस्सेदारी के हिसाब से 2019 नतीजे आने के बाद बीजेपी विरोधी सरकार बनाने की कोशिश होगी, तो ऐसे में मिलकर लडऩे के लिए सीटों के बंटवारे का समझौता कैसे हो पाएगा, कोई भी पार्टी कम सीटों पर चुनाव लडऩे को तैयार नहीं है। एक ओर उत्तर प्रदेश मेें बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने साथ मिलकर 2019 के चुनाव लडऩे के फैसला किया। वहीं उन्होंने किसी-किसी जगह पर कुछ छोटी पार्टियो के लिए भी सीटे छोड रखी है। साथ ही रायबरेली और अमेठी पर कोई भी उम्मीदवार खड़ा नहीं करेगी। मतलब साफ है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी का कड़ा मुकाबला सपा-बसपा गठबंधन से है। वही बिहार में जेडयू, आरजेडी, कांग्रेस, बीजेपी, एलजेपी के कुछ पार्टियों में गठबंधन के साथ जबरदस्त मुकाबला है, वहीं महाराष्ट्र में कांगे्रस और एनसीपी साथ में मिलकर चुनाव लडेंगे तो बीजेपी और शिवसेना का साथ नहीं दिख रहा है। कर्नाटक में जेडीएस के साथ कागे्रंस का गठबंधन है वही तमिलनाडू, पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय पार्टी सदा दूसरी पार्टी पर भारी पडी है।
क्या मोदी अपनी साख बचा पाएंगे?
देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आगामी लोकसभा चुनाव में कांगे्रस समेत कई क्षेत्रीय पार्टीयों ने महागठबंधन बना लिया है। अब किस प्रकार मोदी अपनी पार्टी और अपने पद को बचाने में कामयाब होते हैं। वैसे मोदी देश की जनता के बीच पसंदीदा नेता है, लेकिन पिछले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे उनके और उनकी पार्टी लिए अच्छे नहीं गए, वहीं अबकी बार विपक्ष भी मजबूत नजर आ रहा है। चुनावी वर्ष होने की वजह से कई मुद्दों पर राजनीतिक उथल-पुथल भी हो रही है। इसके कई उदाहरण भी देखे जा सकते है, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी का एक साथ आना, तेलुगू देशम का एनडीए से बाहर जाना, शिवसेना की भाजपा से बढ़ती दूरी और जनता दल यूनाइटेड और भाजपा के बीच सीटों के तालमेल पर पेंच फंस जाना।
प्रियंका का राजनीति में प्रवेश क्या कांग्रेस को जीत
दिलवाएगा ?

प्रियंका गांधी में उनकी दादी इंदिरा गांधी का अक्स दिखता है, वो उसी तरह से काम भी करती हैं। बोलती भी वैसे ही हैं और लोगों को उनसे उम्मीद भी है, इसलिए उत्तरप्रदेश का कांग्रेसी उत्साह से लबरेज़ है। उन्हें सक्रिय राजनीति में कांग्रेस का महासचिव बनाया है, लेकिन उनके पति राबर्ट वाड्रा पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपो का असर प्रियंका और उनकी पार्टी को कुछ हद तक नुकसान भी पहुंचा सकती है।
होगी कड़ी टक्कर
चुनावी लोकतंत्र में पार्टियों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है और पार्टियों के विचार और वादों के आधार पर चुनाव लड़े जाते है। पिछले कुछ समय से भारतीय चुनावी राजनीति में चर्चा का केंद्र पार्टी के बजाय व्यक्ति होने लगे हैं। अविश्वास प्रस्ताव के बाद भी मुद्दों पर चर्चा होने के बजाय सारा फोकस इस सवाल पर चला गया कि क्या राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे?
नरेंद्र मोदी आज के दौर के सबसे लोकप्रिय नेता है, इससे पहले भी इस देश में कुछ लोकप्रिय नेता हुए हैं जो जनता से खुद को आसानी से जोड लेते थे, लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिला है कि एक ही समय में दो प्रतिद्वंद्वी पार्टियो से ऐसे दो लोकप्रिय नेता हुए हों, जिनका जनाधार एक समान रूप से सारे देश में हो और ये कभी देखने को नहीं मिला है कि किसी दोतरफा चुनाव में सत्ताधारी लोकप्रिय नेता को विपक्षी पार्टी के लोकप्रिय नेता ने हरा दिया हो। इसलिए 2019 के चुनाव में अगर सिर्फ राहुल गांधी के भरोसे नरेंद्र मोदी को हराने के बारे में सोचा जाता है तो यह एक मुश्किल लक्ष्य है। लेकिन अगर राहुल गांधी कई अहम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक मजबूत गठबंधन करने में सफल होते हैं, तो 2019 के दंगल का परिदृश्य बदल सकता है, 1977 और 1989 के चुनाव इसका उदाहरण हैं।
क्या महागठबंधन?
सत्ताधारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बीजेपी पार्टी को आगामी लोकसभा में हराने के लिए विपक्षी दलो ने एक गठबंधन बनाया है, जो एकजुट होकर एक दूसरे का साथ देकर बीजेपी का हराने का प्रयास करेगी। इनमें से अलग-अलग पार्टियों में कुछ बड़े नेता कई बार एक मंच साझा करते दिख रहे। जिनमें राहुल गांधी, शरद पंवार, फारूक अब्दुला, मुलायमसिंह यादव, सीताराम येचुरी, अखिलेश यादव, मायावती, चन्द्रबाबू नायडू, अरविंद केजरीवाल, शरद यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव शामिल है। यह महागठबंधन आगामी लोकसभा के चुनावी समर में क्या गुल खिलाएगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन गठबंधन की सरकार कब तक चली यह तो जनता मालूम ही होगा। वही पीएम पद के दावेदारी करने वाले नेताओं की संख्याओं में इजाफा भी हो सकता है।
कब-कब टूटा गठबंधन
भारतीय लोकतंत्र की राजनीति संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। जहां जमीनी सच्चाई गठबंधन की सरकार की ओर धकेल रही है। लगभग पिछले एक दशक से भारतीय राजनीति में केन्द्र और राज्यों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण विभिन्न दलो की मिलीजुली सरकार गठबंधन की सरकार बनी है, लेकिन गठबंधन की सरकार जब-जब बनी है। उस सरकार ने अपना कार्यकाल कभी- कभी ही पूरा किया है। साल 1977 में पहली बार कांग्रेस मुक्त सरकार बनी, जिसमें मोरारजी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। जिसमें संगठन कांग्रेस, जनसंघ, भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी तथा लोकतांत्रिक कांगे्रस जैसे घटक दल शामिल हुए। लेकिन घटक दलो के आपसी मतभेद के कारण इस सरकार की बीच मेें अकाल मुत्यु हुई। गठबंधन सरकार का दूसरी बार प्रयोग 2 दिसम्बर 1989 हुआ, जिसमें जनता दल, तेलगू देशम, असम गण परिषद, कांगे्रस और आरडीएम जैसे क्षेत्रीय दल भी घटक दल के रूप में भागीदार थे। यह सभी दल गठबंधन में सहयोगी होते हुए राष्ट्र के विभिन्न विकास के मुद्दो आपसी मतभेद रखते थे। जो अन्तत: गठबंधन सरकार के असमय पतन का कारण बना। भारत में कई बार गठबंधन की सरकर बनी, जिसमें 28 जुलाई 1979, 1989, 1990 और 1991 में कई बार गठबंधन सरकार स्थापना हुई और अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिर गई। वही 1996 तथा 1997 में वाजपेयी व देवगौडा की गठबंधन सरकार बनी, जो अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर गई। 11वी लोकसभा त्रिशंकु सरकार, जो कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठन हुआ। वो महज 13 दिन तक ही चली। 12वें लोकसभा चुनाव में पुन: अटल बिहारी के नेतृत्व घटक दलो को जोडकर सरकार बनी, लेकिन महज 13 महिनों में सरकार का अंत हुआ। 13 वीं लोकसभा का चुनाव 1999 में एक बार फिर से त्रिशंकु के रूप में गठन हुआ। जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लडा गया। इसमें सर्वाधिक 24 घटक दलो के साथ सरकार ने 5 वर्ष का पूर्ण कार्यकाल किया। 14 वें लोकसभा चुनाव कांग्रेस मनमोहन सिंह के नेतृत्व लडा गया, जिसमें छोटे-छोटे घटक दलों को मिलाकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनाई 5 वर्ष पूर्ण किए। 15 वीं लोकसभा चुनाव दो प्रमुख राजनीतिक गठबंधन संयुक्त प्रगतिशील और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच लडा गया, जिसमें पुन: मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी और अपना पूर्ण कार्यकाल किया, लेकिन इस सरकार को घोटाला की सरकार के नाम से जाना जाता है। 16वी लोकसभा का चुनाव भारतीय जनता पार्टी के जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व करिशमाई नेता नरेन्द्र मोदी ने किया। मोदी का जनता के दिलो को छूने के वादे, राष्ट्र निर्माण में विकास के वादे ने भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण स्पष्ट बहुमत हासिल करवाया। जो कि लम्बे समय के बाद केन्द्र मेेंं किसी पार्टी को मिला।
राष्ट्रीय विकास में बाधा पहुंचाते क्षेत्रीय घटक दल
भारतीय राजनीतिक मेंं प्रमुख राजनीतिक दलो को अपने स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना होने की दिशा में क्षेत्रीय दलो का सहयोग लेना पडता है। फिर इन क्षेेत्रीय दलों को मिलाकर गठबंधन तैयार किया जाता है। भारतीय राजनीति में छोटे-छोटे दलों की भरमार से बडे प्रमुख दलो को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाता और उनको इन क्षेत्रीय दलो का सहारा लेना पडता। क्षेत्रीय दलो का सहयोग राष्ट्रीय राजनीतिक में अस्थिरता प्रदान करता है क्योकि ये क्षेत्रीय दल राष्ट्र हित नहीं बल्कि अपना क्षेत्रीय हित देखते है। इनकी मांगो तथा सरकार के मध्य हस्तक्षेप के कारण ही गठबंधन सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाते। गठबंधन सरकार के अनुभव से अब तक स्पष्ट हो चुका है कि यह हमारे देश के लिए उचित नहीं है। बार-बार चुनावों के कारण देश के लाखों करोडों रूपयों का नुकसान इन चुनावों मेें हो जाता है। जो कि देश की आर्थिक स्थिति के हिसाब से सही नहीं है। देश में स्थिर राजनीति लाने के क्षेत्रीय दलो को छोडकर प्रमुख दलो के प्रति लोगों का रूझान ही देश हित होगा।

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