चुनावी वादों की सच्चाई

तीखी मिर्ची
विजय शर्मा

मैं कल टीवी पर नायक फिल्म देख रहा था, जिसमें अभिनेता अनिल कपूर ने मुख्यमंत्री के रूप में सिर्फ एक दिन में अपने प्रदेश के हालात को बदल दिया। जनता के दु:ख दर्द का सहायक बन पूरे प्रदेश में चमत्कारी नेता का रोल अदा किया। फिल्म देखने के बाद एकाएक मन में यह ख्याल आता है कि यह फिल्मों की कल्पना हकीकत में क्यों नहीं बदलती है। कभी फिल्में भारत की हकीकत बयां करती थी और नायक हमारे राजनेताओं की नकल करते थे, मगर आज के नेताओं को फिल्मी नायकों की नकल करनी पड़ रही है। आज के नेता नायकों की तरह एक अच्छे अदाकार बन गए हैं। आजकल की राजनीति पर अदाकारी का इतना प्रभाव है कि हर नेता को कुछ ना कुछ दिखावा कर जनता के सामने पेश होना पड़ता है। चुनाव के दौरान अलग अलग तरीके से प्रभावशाली भाषण के जरिए नेता जनता को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। जनता भी उनके प्रभाव में आकर अपने नेता में नायक फिल्म के एक आदर्श नेता की तरह छवि ढूंढने लगती है। उन दिनों जनता में एक भय मिश्रित माहौल बनाया जाता है कि यदि हमारी इस नैया को कोई पार कर सकता है, तो हमारे यह नेताजी हैं, मगर जो सुनहरे बादल चुनाव के दौरान दिखाए जाते हैं। परिणाम आने के बाद बिना एक बूंद गिराए धीरे धीरे छंट जाते हैं। चुनाव जीतने के दबाव में नेताजी ने क्या क्या वादे किए, ये नेताजी खुद भूल जाते हैं। और रही बात जनता की, तो जनता कौनसी बादाम खाकर चुनाव के वादों का हिसाब मांगने वाली है। पिछले लोकसभा चुनाव में कितने वादे किए गए और उन वादों में से कितने पूरे हुए, कितने नहीं, किसको चिंता है? सरकार ने 5 साल में आखिर कितने काम किए हैं। इतने काम तो आजकल फिल्मों में भी नहीं दिखाई देते हैं।
फिल्मों में नेता सिर्फ दो या तीन बार विदेश जाते हुए दिखाई देते हैं, मगर हमारे नेता सुबह 4 बजे उठकर रवाना होते हैं और शाम होते होते आठ- दस देशों की यात्रा करके आ जाते हैं। उनके ड्रेस और उनके डेकोरम को देखकर ही लगता है, यह बड़े दबंग और कर्मठ नेता है। उनकी रोबदार आवाज को देखकर ही जनता अपना दु:ख दर्द भूल जाती है कि उन्होंने 5 साल पहले कौनसे वादे किए थे। अब जनता को भी उन पुराने वादों को तो भूल ही जाना अच्छा है। रोज- रोज पुराने ख्वाब देखने में क्या मजा है। आज कुछ नया ख्वाब देखा जाए और हमारे नेता नए ख्वाब दिखाने में बड़े ही माहिर है। अभी हमारे विपक्ष के नेताजी राहुल गांधी का ड्रेस कोड देखते ही कोई भी आदमी एक जुझारू, कर्मठ कार्यकर्ता को देख लेता है। उनकी कुर्ते की बड़ी- बड़ी बांहे, जिन्हें भाषण के दौरान तीन चार बार ऊपर चढ़ाया जाता है, जिसे देखते ही लोगों को लग जाता है कि यह नेता कार्य करने को कितना उत्सुक है, जिसे कोई मौका नहीं मिल रहा है। अभी प्रदेश चुनाव के कर्जमाफी के वादे में कितना सच रहा और कितना झूठ। इससे क्या लेना- देना, किसान को वैसे भी कौनसी जल्दी है। अभी यह लोकसभा का चुनाव आ गया है। यह होते ही और नए वादे होंगे, उन वादों में सच्चाई ढूंढ़ेेंगे।
आजकल तो प्रियंका गांधी के बड़े चर्चे है। प्रियंका गांधी को देखते ही हर किसी को इंदिरा गांधी याद आ जाती है। प्रियंका ने अपनी हेयर स्टाइल और साड़ी पहनने का तरीका भी ऐसा रखा है कि दूर से देखने पर भ्रम होता है कि जैसे इंदिरा गांधी ही पुनर्जीवित होकर लौट आई हो, लेकिन क्या प्रियंका गांधी को भी आयरन लेडी का खिताब मिलेगा या ऊपर ऊपर आयरन लगा हुआ होगा और अंदर वाड्रा की विवादित जमीन की मिट्टी भर दी जाएगी, यह तो वक्त बताएगा। बहरहाल, बजट के नए वादों में अपने दिल को प्रसन्न करने का जनता प्रयास कर रही है। कहा जा रहा है कि यह यह अंतरिम बजट है, चुनाव जीत गए तब इस बजट को लागू किया जाएगा और चुनाव नहीं जीते, तो फिर इसमें बजट बनाने वाले का क्या दोष। आपको तो यह बजट दिया भी इसीलिए गया है कि आपको सत्ताधारी दल को जिताना है। यदि आपको यह वादे अच्छे लगे तो लगे, तो आपको जीत दिलानी है। वैसे सपने जितने मीठे होते हैं, हकीकत का फल कहां इतना मीठा हो पाता है। मेरे हिसाब से राजनेताओं को फिल्मों की तरह अभिनेताओं का दर्जा मिल जाना चाहिए और राजनीति को सिर्फ फिल्मी तरीके से ही देखने का प्रयास करना चाहिए। इस राजनीति के वादों में सच्चाई ढूंढना गधे के सिर पर सिंग ढूंढने के बराबर हैं।

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