किताबों के बोझ से लदा बचपन

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को जारी परिपत्र 2018 के अनुसार पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को होम वर्क नहीं दिया जाएगा और साथ ही भाषा और गणित ही पढ़ाया जाएगा।

मिरर न्यूज। प्रदेश में प्रारंभिक व माध्यमिक विद्यालयों में और खास तौर से निजी शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्र छात्राओं की उम्र और उनकी क्षमता पर स्कूली बैग भारी पड़ रहा है। औसतन एक बच्चे के बैग में चार से छह किलो वजन होता है, जो उन बच्चों की शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। छात्र- छात्रा की उम्र के आधार पर बैग का वजन केन्द्र सरकार द्वारा नवम्बर 2018 में तय कर दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर आज तक भी उसकी पालना नहीं हो पाई है। इसकी मुख्य वजह शिक्षा महकमे की उदासीनता है। इस कारण निजी स्कूल संचालक प्ले, नर्सरी से ही अनावश्यक पाठ्यक्रम जारी कर देते हैं, जिसकी वजह से बच्चों के शारीरिक और उनके मानसिक स्तर पर भी अनैतिक दबाव पड़ रहा है। फिर भी इसको लेकर न तो अभिभावक गंभीरता से ध्यान दे रहा है और न ही सरकार व शिक्षाविदों को परवाह है।
सिरोही जिले में नर्सरी से पांचवीं, आठवीं, दसवीं एवं 12वीं तक की करीब 500 निजी विद्यालय संचालित है। इन स्कूलों में नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी में भी दो से तीन तीन पुस्तकें और कॉपियां भी काम में ली जा रही है। निजी स्कूल में पहली कक्षा के बैग का वजन औसतन 4 से 6 किलो वजन हो रहा है। इस कारण बच्चों के शारीरिक विकास पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है।
लम्बे समय से चर्चा में है यह मुद्दा
स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ काफी समय से चर्चा का विषय रहा है। पहलीं से लेकर 10वीं क्लास तक के बच्चे के बैग का काफी वजन होता है। इससे उनको स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। स्कूली बच्चों के बस्ते के वजन की समस्या को सबसे पहले बार 1993 में यशपाल कमेटी ने उठाया था। कमेटी ने प्रस्ताव रखा था कि पाठ्यपुस्तकों को स्कूल की संपत्ति समझा जाए और बच्चों को स्कूल में ही किताब रखने के लिए लॉकर्स अलॉट किए जाए। इसमें छात्रों के होमवर्क और क्लास वर्क के लिए भी अलग टाइम, टेबल बनाने की मांग रखी गई थी, ताकि बच्चों को रोजाना किताब घर न ले जानी पड़े। फिर भी वे कानून कायदे अब तक भी जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाए।
एनसीएफ का यह है परिपत्र
बच्चों के बस्ते के बोझ की समस्या को देखते हुए नेशनल करिकुलम फे्रमवर्क (एनसीएफ) ने 2005 में एक परिपत्र जारी किया। उस परिपत्र में बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने के सुझाव दिए गए थे। एनसीएफ 2005 के आधार पर एनसीईआरटी ने नए पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तिकाएं तैयार की, जिसे सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों ने अपनाया। कई राज्यों ने एनसीएफ 2005 के आधार पर अपने पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तिकाओं में बदलाव किया।
एच आर डी मिनीस्ट्री द्वारा जारी निर्देश
स्कूली बच्चों द्वारा भारी भरकम बैग को लेकर स्कूल जाने पर लम्बे समय से सवाल उठाया जाता है लेकिन अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इससे निजात दिलाने का मन बना दिया है। मंत्रालय ने 2018 में परिपत्र जारी कर राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को यह निर्देश दिए कि पहली क्लास से 10वीं तक के लिए बच्चों के स्कूल बैग के वजन को निर्धारित कर दिया है। इससे मासूम बच्चों को भारी भरकम स्कूली बैग को उठाने से छुटकारा मिल जाएगा और हेल्थ संबंधी दिक्कतों से भी निजात मिल जाएगी। इसके साथ ही बच्चों के होम वर्क को लेकर भी नियम बनाया गया है।
स्कूली बच्चों के भारी भरकम स्कूली बैग उठाने से बच्चों की कमर पर बुरा असर पड़ रहा था। बच्चों की सेहत को देखते हुए सरकार ने नई गाईड़लाईन जारी कर दी है।
गाईड़लाईन के अनुसार

  1. इस नियम के मुताबिक पहली और दूसरी क्लास के बच्चों के बस्ते का वजन 1.5 किलोग्राम से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
  2. तीसरी और चौथी क्लास के बच्चों का बस्ते का वजन 2 से 3 किलोग्राम तक होना चाहिए।
  3. 6वीं से 7वीं तक के छात्रों के बस्ते का वजन 4 किलोग्राम से ज्यादा नहीं
    होना चाहिए।
  4. आठवीं से नौंवीं क्लास तक के बच्चों के बैग का वजन 4.5 किलोग्राम तक होना चाहिए।
  5. दसवीं क्लास के बच्चों के बैग का वजन 5 किलोग्राम तक होना चाहिए।
    होम वर्क से छुट्टी, तो बस्ते का बोझ भी होगा कम
    गाईड़लाईन के अनुसार पहली और दूसरी क्लास में पढऩे वाले बच्चों को होमवर्क नहीं दे सकते है। ऐसे निर्देश दिए गए है कि बच्चों को सिर्फ भाषा और गणित ही पढ़ाया जाएगा। तीसरी से पांचवी कक्षा के बच्चों को भाषा, ईवीएस और गणित एनसीआरटी के सिलेबस से ही पढ़ाया जाए और यह भी कहा गया है कि बच्चों को स्कूल में कोई भी एकस्ट्रा किताब और कोई भारी सामान लेकर न आएं। जिससे उनका बैग भारी हो सकता है।
    यह है अन्तर्राष्ट्रीय नियम
    अंतरराष्ट्रीय नियम के मुताबिक बच्चों के कंधे पर उनके कुल वजन से 10 फीसदी ज्यादा वजन नहीं होना चाहिए। इसको यूं समझें जैसे अगर बच्चे का वजन 20 किलोग्राम है। इसका 10 फीसदी हुआ 2 किलोग्राम। यानी 20 किलोग्राम वजन वाले बच्चे के बस्ते का वजन 2 किलोग्राम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि 8वीं क्लास तक के बच्चों को 5 किलोग्राम से ज्यादा वजन ढोना पड़ता है।
    सीबीएसई के निर्देश
    स्कूल बैग का वजन कम करने के लिए सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंड्री एजुकेशन (सीबीएसई) ने भी दिशा निर्देश जारी कर रखा है, जो इस तरह से हैं-
  6. प्राइमरी क्लास के लिए जरूरत से ज्यादा छात्रों को पुस्तक लेने को नहीं कहा जाए और पाठ्यपुस्तकों की संख्या सीमित होनी चाहिए। नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने जो सीमा तय कर रखी है। उससे ज्यादा इसकी संख्या न हो।
  7. पहली और दूसरी क्लास के छात्रों के लिए स्कूल बैग न हो और उनको अपना स्कूल बैग स्कूल में छोडऩे की अनुमति हो।
  8. पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को होमवर्क नहीं दिया जाए। तीसरी और चौथी क्लास के बच्चों के लिए होमवर्क की जगह कुछ और विकल्प दिया जाए।
  9. स्कूल बैग के अनावश्यक बोझ से छुटकारे के लिए विवेकपूर्ण टाइम टेबल तैयार किया जाए।
    यह है वर्तमान हालात
    मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) की ओर से विशेष परिपत्र जारी करते हुए निर्देश दिए गए है लेकिन उसके बाद भी जिले में लगभग सभी निजी स्कूलों में इन नियमों की पालना नहीं हो पा रही है और निजी स्कूलों को इन नियमों की पालना करने के निर्देश देने वाले स्थानीय शिक्षा विभाग के अधिकारी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा दिए गए निर्देशों की जानकारी ही नहीं है तो फिर निजी स्कूलों द्वारा इन नियमों की पालना कैसे संभव है।
    निजी स्कूलों में नियमों की पालना नहीं
    मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2018 में पत्र जारी कर निर्देश दे दिए थे लेकिन स्कूलों को सेशन 2019 से ही क्लास के हिसाब से बस्ते के वजन को लागू करना था लेकिन स्कूल प्रशासन ने स्कूली किताबों के पैकेज बना रखे है। जहां पहली और दूसरी क्लास में सिर्फ भाषा और गणित के निर्देश दे रखे है वहां बच्चों को ईवीएस, जीके, कम्प्यूटर और अन्य की अतिरिक्त किताबों का बोझ भी लाद रखा है। साथ ही पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को होमवर्क भी दिया जा रहा है। वहीं निजी स्कूलों द्वारा एनसीआरटी के सिलेबस को ध्यान में नहीं रखते हुए अन्य प्रकाशको की पुस्तकें पढ़ाई जा रही है और सबसे ध्यान देने वाली बात तो यह है कि यह पुस्तकें बाजार में कई नहीं मिलती है इसका व्यापार भी स्कूल प्रशासन द्वारा ही किया जाता है और निजी प्रकाशकों से बड़ा कमीशन उठाते है। जिसको रोकने में स्थानीय शिक्षा विभाग के पास समय ही नहीं है वे तो सिर्फ मिटिंगों का बहाना बना कर व्यस्त रहते है। और उनकी व्यस्तता निजी स्कूलों की मनमानी बन गई है।

बस्ते के बोझ पर चिंतन जरूरी
वेल डिसिप्लिन्ड एक शब्द है, जो भद्र लोगों के लिए उपयोग किया जाता है। ये असामान्य सा शब्द उन लोगों के लिए था, जो ये मानते थे कि दुनिया में कई सारी चीजें हैं, जिनके जवाब हो सकते हैं, लेकिन वो जवाब किसी को नहीं मिल सकते। इसलिए मानव को उन जवाबों को स्वीकार लेना चाहिए, जो मानव समाज को जोड़कर रख सकें। इन सॉफिस्ट लोगों को उन सभी को शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया जाता था, जो यूनान की नई गणतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू ढंग से चला सकें। नए सवालों को हतोत्साहित करने की प्रक्रिया किसी भी सरकार के लिए सबसे बेहतर साधन हो सकती है। अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए वर्तमान समय में हमने छोटे छोटे कंधो पर इतनी बड़ी बड़ी जिम्मेदारियां लाद रखी है कि बचपन बिल्कुल खत्म सा हो चुका है।
बढ़ती भेड़चाल में हमने अपने नन्हे मुन्हों के लाइफ स्टाइल को एक तरह से रोबोटिक कर के रखा हुआ है। कुकुरमुत्तों की तरह उगे अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों ने काफी हद तक बचपन को खत्म करके रख दिया है। एक अजब सी लूट मची है, खिंचतान है, भागमभाग है, किन्तु इन सबके बीच हमने कभी नहीं सोचा की इतना भार उठाए ये बचपन, बचपन कहां रह गया।
लाओत्से कहते हैं कि ‘दी लीस्ट गवर्नमेंट इज द बेस्टÓ। बस यहीं से सवाल शुरू होता है। मानव सभ्यता का सबसे अलौकिक क्षण कौनसा रहा होगा? एथेंस के एक्रोपोलिस में किसी संधि प्रस्ताव के लिए जब एक एक नागरिक के उठे हुए हाथों की गिनती की जा रही होगी? एक नागरिक खुद को प्रशासन का हिस्सा समझ रहा होगा। ओलम्पस में किसी ग्लैडिएटर की जान इसलिए बख्श दी गई होगी कि उसने जनता का दिल जीत लिया होगा? पर उस दिन जनता क्या नशे में रही होगी, जब उसने सुकरात को जहर का प्याला पकड़ा दिया? शायद वो नशे में थी, सब कुछ जान लेने के नशे में, जो जानती थी उसके विश्वास के नशे में, जिस पर विश्वास था उस विश्वास के डगमगा जाने के डर के नशे में। पर इससे कुछ बदल नहीं जाता। वो दिन अलौकिक था, जब मनुष्य को निर्णय की स्वतंत्रता मिली होगी। इस अलौकिकता के मोल में हजारों सुकरातों को होम हो जाना पड़ेगा। वो दिन अलौकिक था, जब मनुष्य ने मनुष्य होने के मूल्य का अनुभव किया होगा। उस दिन वो रात अपनी देहरी में बैठ कर पूरी मानव जाति के लिए अपनी विशिष्ट योजनाएं बना रहा होगा। वो तय कर रहा होगा कि एक दिन वो सृष्टि के हर हिस्से की गतिविधियों को किस तरह नियंत्रित करेगा। मानव को अपनी निर्णय क्षमता पर गर्व हुआ होगा। सोचिए उसने आगे क्या किया होगा, क्या फिर कभी उसने अपने ज्ञान पर संदेह किया होगा? निश्चय ही वह मनुष्य के गुलामी के शुरुआत के दिन थे। शासन का आदी हो जाना कितना गौरवपूर्ण रहा होगा। जरा सोचिए कि मानव ने अपने अनगिनत प्रयास विभिन्न तरह के शासन स्थापना में लगा दिए, दुनिया के कई खूबसूरत दिमाग शासन प्रणालियों की व्याख्या में खप गए। गुलामी भोगने की परिकल्पना को मुक्त होने सरीखी उपमाओं से नवाजते हुए मानव का मूल स्वरूप कभी आंदोलित नही हुआ? एक सुंदर और मुक्त मष्तिष्क कैसा होता होगा, प्रकृति की किन चीजों को वह दुनिया के खूबसूरत उपहारों में गिनता होगा? उसके ईश्वर की वेशभूषा कैसी होगी। उसका ईश्वर होगा भी या नहीं कौन जानता है।
दुनिया सॉफिस्टों से भर चुकी है। ज्ञान धाराओं में प्रवाहित होकर सुंदर दिमागों पर छाता चला जा रहा है। सब कुछ तराश देने की होड़ में मनुष्य अपनी जाति के अगले पायदान पर कदम रखने के लिए बेकाबू है। एक दिन सब कुछ ठीक वैसा ही हो जाएगा, जैसा कि कुछ लोगों ने तय कर लिया होगा। तब आप अपनी मौलिकता के लिए लडऩा बन्द कर चुके होंगे। हताश होना कोई नहीं प्रक्रिया नहीं है, कई सदियां हताशा से भरी रही हैं, जहां मानव शाब्दिक परछाई बना खुद के जीवन को सांचों में ढालने के लिए व्यस्त था।
आज इस पूरे जगत में कोई सबसे व्यस्त है, तो वो है इंसानी सोच। जिसने स्तरहीन कार्यो और अपने अकर्मक सोच से पूरे मानव जाति के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। हमने क्या किया, क्या पाया, क्या बना रहे, ये सोचने के बजाय ये सोच रहे कि अपनी नस्लो को कितनी अंग्रेजी पढ़ा दे, कितना जल्दी उम्र से पहले बड़ा कर दें और कितना तेज होकर ब्रह्माण्ड को मु_ी में कर लें, किन्तु ये सब मानसिक क्षीणता है, जो हमारे बचपन, युवावस्था और प्रौढ़ता को गर्त में ले जा रही। चिंतन की आवश्यकता है कि अपने खत्म होते बचपन को कैसे बस्तो के बोझ से निकाले, कैसे इन नन्हें-नन्हें हाथों को फिर से आसमां की ओर उठा कर ये कहे कि हे! भगवान हम सब आप की सत्ता में आपके ही सानिध्य में जीवन का रस पी रहे, हमारा सर्वथा कल्याण करें।

पंकज कुमार मिश्रा
जौनपुरी

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