कब बदलेगी शिक्षा प्रणाली, अभी छात्र बन रहे रट्टू तोते, जिससे बौद्धिक विकास संभव नहीं -

कब बदलेगी शिक्षा प्रणाली, अभी छात्र बन रहे रट्टू तोते, जिससे बौद्धिक विकास संभव नहीं

हमारी शिक्षा  पद्धति मेकाले ने थोपी और हमने स्वीकार कर ली। हमें बड़ा गर्व होता है कि हमारा बच्चा अंगे्रजी शिक्षा पद्धति से पढ़़ाई कर रहा है। एक तो माध्यम अंगे्रजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है, तो सबको आनी चाहिए, तो ठीक है। अंगे्रजी का ज्ञान हो जाए, यह अच्छी बात है, लेकिन अंगे्रजी माध्यम से ही पढ़ाया जाए और अंग्रेजी तरीके से ही पढ़ाया जाए, यह कहां तक उचित है।
अपनी मातृभाषा में पढऩे वाला बच्चा हर चीज को समझकर पढ़ता है, लेकिन दूसरी भाषा में पढऩा मतलब एक बार उसका अनुवाद करना और फिर समझना एक जटिल तरीका और इसमें भी कई बार बच्चा सिर्फ रट लेता है कि मेरे नंबर कम ना आ जाए। 
अब बात है पढ़ाई के तरीके की, तो पहले हमारे यहां गुरुकुल चला करते थे। उसके बाद महाविद्यालय, विश्वविद्यालय भी रहे। वो पढ़ाई जीने का ही एक तरीका थी, एक जीवनशैली और बाद का जीवन कैसे जीया जाए, उसका तरीका समझाते थे। 
मेकाले ने यह सब देखा और हमारी परीक्षा पद्धति से ईष्र्या कर हम पर यह पद्धति थोप दी। तब हम अंग्रेजों के गुलाम थे, सो मान लेना पड़ा, पर अब क्यो माने जा रहे हैं। जिसमें सिर्फ याददाश्त की परीक्षा है। बच्चे कुछ चीजे रटकर जाते हैं और लिख देते हैं, जो ज्यादा रट सकता है, वो ज्यादा लिख सकता है और उसको हम बुद्धिमान कहते हैं, जबकि बुद्धि का याददाश्त से दूर तक कोई लेना देना नहीं है। हम रटाकर उनकी प्रथम बुद्धि खराब कर रहे हैं। जितना बच्चे ज्यादा रटने के आदि होंगे, उतनी बुद्धि विकसित होने की क्षमता घटेगी। पर हमारे मन में यही डर है कि हमारा बच्चा अच्छे माक्र्स नहीं लाया तो नौकरी नहीं मिलेगी, तो हम ज्यादा से ज्यादा रटवाना चाहते हैं, जबकि हमारे सामने कितने उदाहरण है कि जो स्कूल में पढ़ ही नहीं पाए और महान वैज्ञानिक बना। एडिसन को स्कूल से निकाल दिया गया। क्योंकि वो रट नहीं पाते थे और उन्होंने एक हजार आविष्कार किए। आईस्टीन से किसी ने पूछा कि सूर्य से पृथ्वी तक आने में प्रकाश की किरणों को कितना टाईम लगता है। तो उन्होंने बोला- मुझे याद नहीं है। उसके लिए क्यों में अपना दिमाग खराब करुं। इसकी जब जरूरत पड़ेगी, किसी किताब में देख लुंगा। 
आज का 90 फीसदी किताबी ज्ञान जीवन में कहीं भी काम नहीं आता। फिर भी हमारी सारी पढ़ाई उसको रटाने में है। बाकी बुद्धि को विकसित करने में बच्चों पर उसको रटने का जो दबाव है, उससे कितनी ही मानसिक बीमारियां हो जाती है। हमें उसका पता नहीं है, कई बच्चे तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। अत: इस रटन विद्या को ज्यादा गंभीर ना ले, बच्चों की बुद्धि विकसित होने दें। साधारण नौकरी की परवाह ना कर  बच्चे को आईस्टीन जैसा बुद्धिमान बनाए। भारत की प्राचीन सुदृढ़ शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित कर लागू करने की आवश्यकता है, जिससे बच्चों का बौद्धिक विकास हो सकें।  

डॉ. प्रकाश शर्मा
श्रीजी होम्योपैथिक क्लीनिक,
पचास फीट रोड कांकरोली

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