औद्योगिक मंदी की मार में बेकाबू बेरोजगारी

राजसमंद विशेष:- जयवर्धन

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक मंदी तथा देश में नोटबंदी व जीएसटी लागू होने के बाद औद्योगिक जगत बूरी तरह से मंदी की चपेट में है। इसका व्यापक असर ऑटोमोबाइल सेक्टर, टैक्सटाइल उद्योग के साथ बड़े स्तर पर रोजगार देने वाले कारखानों पर पड़ा है। अनवरत घटती बिक्री के कारण कई कारखानों ने उत्पादन घटा दिया है। उनके गोदामों में बड़ी तादाद में माल का स्टॉक पड़ा है। जो उद्योग पहले चारों शिफ्ट में चलते थे, आज सिर्फ एक शिफ्ट संचालित हो रहे हैं, जिससे तीन शिफ्ट में कार्य करने वाले श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं। पूरे देश के साथ ही बेरोजगारी की समस्या राजसमंद जिले में भी उभर कर सामने आई है। यहां मार्बल- गे्रनाइट की खदानें, मार्बल गैंगसा युनिट, कटर के साथ मिनरल (क्वार्टज- फेल्सपार) प्लांट भी ज्यादातर बंद के कगार पर है। विदेशी मार्बल व सिरामिक टाइल्स बाजार में आने के बाद से ही मार्बल की बिक्री घटने लगी थी, मगर अब गहरी होती खदानों से घटते उत्पादन, बढ़ती लागत, महंगे टैक्स, लगातार घट रही बिक्री के कारण बाजार में कारोबारियों के लिए टिके रहना मुश्किल होता जा रहा है। इसके चलते राजसमंद जिले में पिछले कुछ वर्षों में 500 मार्बल खदानें और 300 से अधिक मार्बल कटर बंद हो चुके हैं। कुछ गैंगसा युनिट एक तो कुछ दो शिफ्ट में ही संचालित होने लगे हैं। इस कारण करीब 20 हजार से ज्यादा मजदूरों के साथ सुपरवाइजर, तकनीकी कार्मिक व लेखाकर्मी के रूप में कार्य करने वाले शिक्षित युवा भी बेरोजगार हो गए हैं। मार्बल उद्योग में फैली बेरोजगारी व मंदी का असर पूरे राजसमंद की जनता पर पड़ा है।
बाजार पर विपरीत प्रभाव
मार्बल उद्योग की मंदी व बढ़ती बेरोजगारी के कारण जिले के बाजार पर भी विपरीत प्रभाव पड़ा है। खानों, गैंगसा युनिट, गोदामों के आस पास की किराणा दुकानें, चाय की थड़ी होटल- रेस्टोरेंट भी काफी बंद हो चुके है।
ठप के कगार पर ट्रांसपोर्ट व्यवसाय
मार्बल, ग्रे्रनाइट व टाइल्स के आदान प्रदान में संलग्न ट्रांसपोर्ट कारोबार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ट्रेक्टर, कम्पे्रशर, ट्रक, ट्रेलर, डम्पर के साथ ऊंटगाडिय़ों चलाने वाले को सप्ताहभर दो से तीन भाड़े ही मिल रहे हैं, जिससे वाहनों का टैक्स, किश्तें भरने के साथ चालक व सहायक श्रमिकों का गुजारा चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में कई लोग नए व्यवसाय का विकल्प तलाश रहे हैं, वहीं कई लोग रोजगार के लिए भटक रहे हैं।
भूखंड-मकान के खरीदार ही नहीं
नोटबंदी के बाद से रियल स्टेट का कारोबार मंदी का शिकार हो गया था, मगर अब राजसमंद में मार्बल उद्योग मंदी ने बूरी तरह से प्रभावित किया है। नई कॉलोनियों के प्लान धरे के धरे रह गए हैं, तो महंगी दरों पर खरीदे गए भूखंड व मकान अब लोग सस्ती दर पर बेचने को मजबूर हो गए हैं।
सबसे ज्यादा प्रभावित है ऑटो सेक्टर
जुलाई 19 में कार और बाइक्स की बिक्री में 41 फीसदी की गिरावट आई हैं। इसके चलते ऑटो सेक्टर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों को नौकरियों से निकाला गया हैं। इतना ही नहीं करीब 10 लाख से ज्यादा लोगों की नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा हैं। खेती के बाद सबसे बड़ा लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने वाले कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल सेक्टर) की भी हालत खराब है। यह सब पैरामीटर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि भारत भी वैश्विक मंदी में झकड़ता जा रहा हैं।
पहली मंदी आई थी 1991 में
आजादी के बाद 1991 की पहली मंदी आई थी। उस आर्थिक मंदी के पीछे आंतरिक आर्थिक कारण थे। 1990 के अंत में खाड़ी युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था पर आंच आई थी। कच्चे तेल के भावों में भारी बढ़ोतरी से आयात-निर्यात व्यापार संतुलन गड़बड़ा गया था। उत्पादन लागत मूल्य निर्धारित मूल्य से ज्यादा आ रहा था। बिक्री मूल्य कम होने से भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ गया था। सरकार अन्तर्राष्ट्रीय कर्ज चुकाने में असमर्थ होने लगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सरकार ने रिजर्व बैंक का सोना गिरवी रख भारत की आंतरिक अर्थव्यवस्था को संभाला। चंद्रशेखर सरकार अपना वार्षिक बजट तक पेश नहीं कर पाई थी। दूसरी बड़ी मंदी 2008 में आई। यह भी वैश्विक मंदी थी। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को उतना नुकसान नहीं हुआ था। वैश्विक मंदी का दीर्घकालिक असर नहीं होता हैं।
वर्तमान में है वैश्विक मंदी
वर्तमान में जो मंदी है, वह भी वैश्विक मंदी हैं। अमेरिका-चीन के व्यापारिक रिश्तों में तल्खी व अमेरिका द्वारा चीन सहित कुछ देशों पर वित्तीय व व्यापारिक प्रतिबंधों से यह मंदी आई हैं। आरबीआई ने वैश्विक मंदी को देखते हुए अपनी मौद्रिक समिति की बैठक में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी ग्रोथ रेट पूर्वानुमान से घटकर 6.0 फीसदी कर दी है। भारतीय बैंकिंग, बीएसएनल, हिन्दुस्तान ऐयरोनोटिकल, भारतीय डाक सेवा घाटे में चल रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत सरकार में कमजोर आंकडों पर चल रही हैं। मोदी सरकार 2.0 के पहले बजट के बाद बाजार में निवेशकों के 12 लाख करोड़ डूब चुके हैं। नोटबंदी आर्थिक सुधार की जगह एक बड़ा आर्थिक संकट लेकर आया। जीएसटी से बाजार में बड़ा आर्थिक संकट आया, जिसका खराब असर देखने को मिला। लिहाजा, सरकार को अर्थव्यवस्था में छोटे संस्थागत सुधार की बजाय बड़े और व्यापक बदलाव करने होंगे। बैंकों में तरलता बढ़ाकर जीएसटी संशोधन कर न्यूनतम स्तर पर लाना होगा। बैंकिंग फ्रोड को रोकना होगा तथा बड़े व्यापारियों, पूंजीपतियों के माफ किए जाने वाले कर्जों की नीति को बंद करनी होगी।

आर्थिक मंदी के ये चार बड़े कारण
-पहली वजह तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं, जिसका असर महंगाई दर पर पड़ा है।
-दूसरी वजह डॉलर के मुकाबले रुपए की घटती कीमत है। एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 72 रुपए हो गई है।
-आयात के मुकाबले निर्यात में गिरावट से देश का राजकोष घाटा बढ़ा और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई है।
-अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर की वजह से भी दुनिया में आर्थिक मंदी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका असर भारत पर भी पड़ा है।
सोने-चांदी के आयात में कमी
मंदी की आहट का ही असर है कि अप्रैल से जून 2019 की तिमाही में सोना-चांदी के आयात में 5.3 फीसदी की कमी आई है, जबकि इसी दौरान पिछले साल इसमें 6.3 फीसदी की बढ़त देखी गई थी। निवेश और औद्योगिक उत्पादन के घटने से भारतीय शेयर बाजार में भी मंदी का असर दिख रहा है। सेंसेक्स 40 हजार का आंकड़ा छूकर अब फिर 37 हजार पर आकर अटक गया है।

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