उफ! यह गर्मी… पर्यावरण से रार, जीवन की हार

आज प्रदेश में ही नहीं पूरा देश गर्मी और पानी के संकट से जूझ रहा है। बढती जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग, पानी का अति अपव्यय, पर्यावरण में लोगों का बढता अतिक्रमण जैसी दुव्र्यवस्था के कारण आज आम जन प्रकृति के प्रकोप को झेल रहा है। पेडों के अभाव में आज व्यक्ति इस तेज चिलचिलाती धूप में छाया को ढूंढता है। गिरते भूजल स्तर में जल को ढूंढता है। इन सब का आखिर जिम्मेदार कौन है?
धरती का तापमान लगातार बढता जा रहा है। जिसके चलते प्रकृति में अनेक नुकसानदेह परिर्वतन हो रहे है। कुल मिलाकर देखें तो बढती गर्मी के लिए कहीं न कहीं मानव जाति कसूरवार है। विकास की दौड में सरपट भागते इंसानो ने पर्यावारण प्रदुषण, पेडों की कटाई, प्रकृति से खिलवाड करते वैश्विक तापमान में जो बढोतरी की है, उसका ही दुष्परिणाम है कि अब प्रतिवर्ष बढी हुई गर्मी एवं तापमान के रूप में सामने आ रहा है।
घटता पानी, बढती प्यास
जो पानी की बर्बादी करते है, उनसे यही पूछा जाना चाहिए कि क्या आपने बिना पानी के जीने कला सीख ली है, तो हमें भी बताएं, ताकि भावी पीढी बिना पानी के जीना सीख सकें। पानी को बर्बाद करने वालों को यह समझना होगा वरना तेल व घी के समान पानी का मौल हो जाएगा। अगर नहीं, तो आज से ही नहीं, बल्कि अभी से पानी की एक-एक बंद को सहेजना शुरू कर दे। अगर ऐसा नहीं किया, तो आने वाला समय मुश्किलों भरा हो जाएगा।
आज अधिकांश जल स्त्रोत प्रदुषित होकर समाप्ति की ओर है। जल संकट साल दर साल गहराता जा रहा है, हरी-भरी जमीन जलविहीन होकर रेगिस्तान में बदलने की स्थिति में है। हवा में बढता जहरीला धुंआ बढते हुए पूरे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में है। आज जब बाढ आती है, सूखा पडता है तो सभी बिलखने लगते है, चीख पुकार मच जाती है, सरकार विरोधी नारे लगने लगते है, कुछ भगवान को भी कोसने लगते है, मगर किसी ने सोचा, कि ऐसा क्यूं है? हमारी अधिकांश समस्याएं विलासिता तथा भोगशीलता के उदे्श्य से ही पैदा हुई है। आज भूजल स्तर इतना नीचे चला गया है कि नलकूप भी हांफने लगे है, बांध सूखने लगे है। प्रशासन पानी के टेंकरों के माध्यम से सप्लाई कर रहे है। लेकिन मोहल्लो में जिस तरह से पानी के लिए लोगों में लडाई होती है उससे तो साफ जाहिर होता है कि तीसरा तीसरा विश्वयुद्ध जरूर पानी के लिए होगा। मानसून एक अवसर देता है कि हम वर्षा जल को संग्रहण कर जरूरत का पानी एकत्र करें। अपने भूगर्मी जल को कायम रखने के लिए हमें और दूसरो को भी जागृत कर जल संरक्षण का प्रयास करें तथा पानी को अधिक व्यर्थ बहाने से रोकें।
जिम्मेदार लोग भी गैर जिम्मेदार
आज जिला मुख्यालय पर देखें तो पेडों की कमी की वजह से लोगों को इस चिलचिलाती धूप को सहने को मजबूर होना पड रहा है। शहर में वृक्षों की कमी से लोग कडी धूप में छांव को तलाश रहे है। जहां तक देखा जाएं तो इसके लिए स्थानीय सरकारी विभाग भी कम जिम्मेदार नहीं है, जिन्होंने गौरव पथ निर्माण के दौरान वर्षो पुराने हरे-भरे छायादार वृक्षों की बली दे दी। आज मुसाफिर इस पथ से जाते है तो उन्हें कहीं भी छाया नसीब नहीं होती। मतलब इस पथ पर चलकर मुसाफिर को किसी भी तरह का गौरव महसूस नहीं होता। कहते है कि पेड लगाओं, जीवन बचाओं। लेकिन हमारे उन बुद्धिजीवियों ने गौरव पथ निर्माण की राह के बीच में आने वाले इन पेडों को काटकर खुद इन्होंने पेडों पर नहीं, बल्कि अपने पैरों पर कुल्हाडी चला दी, जिसका खामियाजा भविष्य में आमजन को झेलना पडेगा। विदेशों में भी सडकों, घरों, मॉल आदि का निर्माण होता है, लेकिन उनके द्वारा सुनियोजित तरीके से पेडों को नुकसान ना पहुंचाकर उसके आसपास से निर्माण का हल निकाला जाता है। इसलिए इन देशों में भीषण गर्मी और जल संकट का प्रकोप कम ही दिखाई देता है। इसलिए ऐसे हालात में यह जरूरी हो गया है कि अपने विकास को इस प्रकार सीमित व व्यवस्थित बनाया जाएं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रह सकें। विकास की प्रक्रिया को इस प्रकार निर्धारित किया जाएं कि उससे प्राकृतिक संसाधनों पर विपरित प्रभाव ना पड़े। यदि विकास के साथ-साथ पर्यावरण की भी गंभीरता से चिंता की जाएं तो बिगडती प्राकृतिक स्थिति पर कुछ रोक लगाना संभव हो सकेगा। मत भूलिए! प्राकृतिक संसाधन इंसान की जरूरतों की पूर्ति तो कर सकता है, किन्तु उसकी लालच की पूर्ति नहीं कर सकता।
आज के दौर में मौसम की मार से लोगों को बचाने के काम में भाभाशाहों का योगदान सर्वोपरी है वरना आज का जनमानस तो पर्यावरण के प्रति पूरी तरह उदासीन हो चुका है। पहले के परिपे्रक्ष्य में जनमानस पर्यावरण की स्थिरता को बनाए रखने में सक्षम था तभी पर्यावरण और मनुष्य के बीच सामंजस्य बना हुआ था वैसा आज संभव नहीं है। आज का मनुष्य अपने स्वयं में विकास के चक्कर में पर्यावरण की बली देने से बिल्कुल भी नहीं कतरा रहा है। जबकि इसके विपरित सामाजिक संस्थाएं व पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों द्वारा जगह-जगह पानी पिलाने के लिए प्याऊ लगाने का इंतजाम करना, यहीं नही, पशु-पक्षियों के लिए भी पानी पीने व भोजन का इंतजाम किया जाता है और उनके द्वारा सडकों के किनारे व आसपास पेड भी लगाएं जाते है, ताकि राह चलते मुसाफिर उन पेडों की छाव में कुछ देर सुस्ता सकें। सच कहें तो किसी भी मौसम का प्रकोप हमारे भीतर के इंसान को आवाज देकर, परस्पर एक-दूसरे की चिंता करने पे्ररित करता है। लेकिन इन पर्यावरणीय लोगों के अलावा अन्यों के पास आर्थिक आपाधापी, स्वार्थ और विकास के इस नए दौर में परस्पर चिंता और लिहाज शायद गायब हो गए है। इसलिए परमार्थ के ये काम अब कम हो गए है। जो हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए काफी घातक हो सकता है।
पर्यावरण संकट से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली जन-धन की आदि की हानि भी इंसान के विकास की रफ्तार को रोक नहीं पाई है। विकास की कोई भी सीमा तय न होने के कारण नतीजा यह है कि पिछले 15 वर्षो से देश में हर वर्ष औसतन तापमान में बढोतरी रिकार्ड की जा रही है। प्रतिवर्ष तापमान बढने से स्थिति बद् से बद्तर होती जा रही है। पिछले वर्ष के भीषण गर्मी ने कई लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। वहीं गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष और भी भीषण गर्मी और जल संकट का प्रकोप जारी है। देश भर में छाई इस गर्मी से लगातार कई मौते हो रही है।
यह तो अभी शुरूआत है, यदि समय रहते पर्यावरण के प्रति आमजन जागरूक नहीं हुआ तो आपकी आने वाली पीढी आपको कभी माफ नहीं करेगी।
प्रकृति हमें बहुत कुछ प्रदान करती है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हम इसका लाभ लेते है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों के साथ खिलवाड ना कर इनका रख-रखाव करें। अपने आने वाली भावी पीढी को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण देना हो तो आज से ही प्रकृति से प्रेम करना सीखें। अपने आसपास पेड लगाएं, वहीं वर्षा जल को संग्रहित करें तथा प्राकृतिक नालों, तालाबों और बांधों को स्वच्छ रखें। तभी इस प्रकृति के प्रकोप से बच पाएंगे और प्राकृतिक शुद्ध वातावरण का आनंद ले पाएंगे।
-विक्रम चौहान

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