अपार जनाधार के बाद और अधिक होंगी जन अपेक्षाएं!

लोकतंत्र के महापर्व लोकसभा चुनाव 2019 का परिणाम आ चुका है। वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत ने फिर एक बार मोदी सरकार के नारे को चुना है। मैं वैचारिक रूप से अपने इस लेख में पूरे चुनाव का दृष्टिकोण और समूचे राजनीति का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूं। साल 2019 का ये आम चुनाव मोदी मैजिक और मोदी विरोध पर लड़ा गया और नतीजा हम सबके सामने हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा 48 बरस बाद हुआ है कि 1971 का आम चुनाव व्यक्ति केंद्रित इंदिरा गांधी और इंदिरा गांधी के विरोध में लड़ा गया था। तब विपक्ष ने इंदिरा हटाओ का नारा दिया, लेकिन इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया और लोकसभा की 352 सीटें जीती थी। यह चुनाव मोदी पर केंद्रित हो गया। विपक्ष ने भी मोदी हटाओ का नारा दिया और मोदी ने गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद हटाओ का नारा दिया, जिसे जनता ने जनादेश में बदल दिया।
मतलब इतिहास दोहराया गया और एक नई इबारत लिखी गई। 2014 के लोकसभा चुनाव के चेहरे भी मोदी ही थे, लेकिन तब विपक्ष की घेराबंदी इस तरह की नहीं थी, जैसी इस बार हुई। सबसे ज्यादा सीटें देने वाले उत्तरप्रदेश में बीएसपी और एसपी ने गठबंधन कर लिया। चुनावी पंडितो ने इस गठबंधन को 100 में से 90 अंक दे दिए और दे भी क्यों ना। क्योंकि जातीय राजनीति करने वाली ये दोनो पार्टियां एक साथ, एक मंच पर दिखी, जिनका संयुक्त वोट शेयर 57 फीसदी था। कभी ये दोनो पार्टियां एक दूसरे की धुरविरोधी हुआ करती थी। इनका एक साथ आना, लगा कि भाजपा उत्तरप्रदेश में दस पंद्रह सीटों पर सिमट जाएगी, पर मोदी मैजिक ही था, जो महागठबंधन के बाद भी बीजेपी का प्रदर्शन लाजवाब रहा और 64 सीट जीत यहां भाजपा ने सबको चौंका दिया।
बात करें बाकी अन्य राज्यों कि तो वहां महागठबंधन के रूप में विपक्ष का विरोध ऐसा कि सारे मुद्दे गौण हो गए। चुनाव के केन्द्र बिंदु सिर्फ मोदी हो गए और मुझ जैसे कई विश्लेषक ये जानते हैं और मानते हैं कि यदि आप व्यक्तिगत अपशब्द या आलोचना में सारे जरूरी मुद्दे छोड़ मोदी मोदी करोगे, तो जनता भी मोदी मोदी ही करेगी। हुआ भी यहीं, क्योंकि विपक्ष लगातार मोदी मोदी कहकर हमलावर हुआ और मोदी जी इसी ताक में थे कि ये जनमुद्दे भूलकर मोदी को निशाना बनाए और बाजी पलट जाए। इसलिए मोदी मैजिक कामयाब रहा। नरेन्द्र मोदी का पिछला इतिहास यही बताता है कि वो विरोध के बावजूद भी भाजपा को संजीवनी देकर लाए और अपनी सरकार में जिस तरह पाकिस्तान को कड़ा जवाब दिया। पाकिस्तान में घुसकर एयर स्ट्राइक की, उससे ये संदेश गया है कि ऐसी स्ट्राइक मोदी ही कर सकता था।
उड़ी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक ने जनता का विश्वास मोदी सरकार पर और बढ़ा दिया और इस राष्ट्रवाद ने बड़ा जनमत तैयार कर दिया। बीजेपी का ये स्लोगन मोदी है, तो मुमकिन है, ने 2014 के स्लोगन अबकी बार मोदी सरकार को पीछे छोड़ते हुए एक मजबूत मंच तैयार कर नई पटकथा लिख दी।
कांग्रेस की खराब नीति और लचर नेतृत्व को देश की आम जनता ने पूरी तरह नकार दिया और ऊपर से कांग्रेसी नेताओं व प्रवक्ताओं की बदजुबानी ने कांग्रेस के लिए कोढ़ में खाज का काम किया। कांग्रेस के कुछ मनबढ़ राजनेताओं ने जमकर अपशब्द बोले तो कुछ बेतुके टीवी प्रवक्ताओं ने लाइव शोज पर कांग्रेस की ही किरकिरी कराई। कांग्रेस ने अपने मेनोफेस्टो में वादा किया कि कश्मीर से धारा 370 नहीं हटाई जाएगी। साथ ही पार्टी ने वादा किया कि वह सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम (अफ्सपा) 1958 में सुरक्षा बलों के अधिकारों और नागरिकों के मानवाधिकारों में संतुलन बनाने के लिए संशोधन करेगी। ये बात भारतीय
जनमानस के गले नहीं उतरी और जनता ने कांग्रेस को विलेन मान लिया, जिसका परिणाम यह रहा कि सात राज्यों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला।
वहीं 1 साल पहले जिन चार राज्यों में विधानसभा चुनाव जीते, वहा हालत बद से बद्तर हो गई, जिसमें मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ शामिल रहा। दूसरी तरफ बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में संकल्प लिया कि जम्मू- कश्मीर से धारा 370 और धारा 35 को हटाने के लिए पार्टी कृत संकल्पित है। यही नहीं पुलवामा हमले के बाद मोदी सरकार ने अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ली। उन पर कड़ा एक्शन लिया, उनकी टेरर फंडिंग की जांच जिस तरह से हुई, उससे ये संदेश साफ गया कि हमारे वोट से आतंकवाद पर चोट हो सकती है। ऐसा सिर्फ मोदी सरकार में ही मुमकिन है।
इसलिए पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ और बीजेपी के पक्ष में माहौल बना। मेरे विश्लेषण में मैं ये भी मानता हूं कि विपक्ष की हार और कांग्रेस की दुर्दश में नवजोत सिद्धू, राहुल गांधी, ममता बनर्जी, मणिशंकर अय्यर और सेम पित्रोदा की बदजुबानी की भी बहुत बड़ी भूमिका रही। मोदी सरकार जनता को ये भी संदेश देने में कामयाब रही है कि वो अच्छा कर रही, तभी विपक्ष एकजुट हो रहा। और तो और आतंकवाद को लेकर जीरो टोलरेंस की नीति है, भी कारगर रही।
संयुक्त राष्ट्र संघ में बार-बार चीन के वीटो के बाद भी मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करना पड़ा। ये सीधे तौर पर मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत थी और जनता में संदेश गया है, ऐसा कांग्रेस की सरकार में मुमकिन नहीं है, ये सिर्फ मोदी सरकार में ही मुमकिन है। कांग्रेस ने अपने मेनोफेस्टों में घोषणा की कि अगर वो सरकार में आए तो देशद्रोह की धारा 124ए को खत्म कर देगी यानी जनता में संदेश ये गया कि कांग्रेस की सरकार आने पर हर विश्वविद्यालय, गली- कूचे से टुकड़े- टुकड़े गैंग निकलने लगेंगे। जबकि बीजेपी का स्टैंड साफ था कि पार्टी टुकड़े टुकड़े गैंग देश में पैदा नहीं होने देगी। राष्ट्रहित सर्वोपरि है। इसलिए बीजेपी ने राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया और पार्टी इसमें कामयाब भी हुई। मोदी मैजिक के पीछे हिंदुत्व के मुद्दे ने भी बड़ा असर दिखाया। चुनावी सीजन में राहुल गांधी का जनेऊ पहनकर मंदिर- मंदिर जाना, उसके बाद पीर- मजारों पर जाना या प्रियंका का नदी नाव सैर, ये सब सियासी नौटंकी नजर आया। राफेल विमान डील पर राहुल गांधी कोई सही तथ्य नहीं दे पाए। हर रैली में राफेल डील पर उनके आंकड़े बदल जाते और चौकीदार चोर वाला मसला देकर राहुल खुद के पैरो पर कुल्हाड़ी मार बैठे। और तो और उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी फटकार मिली।
मोदी सरकार कई योजनाएं गेमचेंजर यानी वोट बटोरू साबित हुईं। ये सभी योजनाएं देश के दूर दराज के इलाकों में जमीन पर उतरी हुई नजर आई हैं। मसलन उज्जवला योजना, एससी एसटी एक्ट, मुद्रा योजना, जनधन, गांव-गांव में सडक़ और बिजली पर काम, गरीबों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना, किसानों को 6 हजार रुपए की सालाना सरकारी मदद और स्वच्छता अभियान ने जमीन पर जनमत बनाने का काम किया है। साथ ही गरीब सवर्णों को 10 फीसदी का आरक्षण जिसमें गरीब अल्पसंख्यकों को जोड़ा गया। इसके विपरीत कांग्रेस की न्याय योजना जिसमें गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने की बात कही गई थी, पर जनता ने विश्वास नहीं किया। पीएम मोदी ने जनता में ये संदेश देने में कामयाब हो गए कि आज जहां वो स्टैंड कर रहे हैं, वो सिर्फ काम के चलते हैं। यानी वो कामदार हैं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सिर्फ नामदार हैं और वो जहां आज स्टैंड कर रहे हैं, वो सिर्फ खानदान के बल पर हैं। यानी राहुल ने ऐसा जमीन पर कुछ नहीं किया है, जो वो पीएम पद के लिए योग्य माने जाएं।
पीएम मोदी और अमित शाह ने अबकी बार 300 पार का दावा क्यों दिया। इसको भी समझने की जरूरत है। बीजेपी का ये दावा हवा- हवाई नहीं था, बल्कि पूरे आत्मविश्वास और सोच समझकर दिया गया नारा था। दरअसल 2014 के आम चुनाव में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो 312 सीटें ऐसी थीं, जिन पर जीत का अंतर 1 लाख से ज्यादा था। इनमें से 207 सीटें बीजेपी ने जीती थीं। इतना ही नहीं इनमें से 42 सीटों पर जीत का अंतर 3 लाख से ज्यादा था। इसी तरह 75 सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों को अपने प्रतिद्वंदी से 2 लाख वोट ज्यादा मिले। इसके अतिरिक्त 38 सीटों पर डेढ़ लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। ये सभी सीटें मिलकर 207 बनती हैं, जो उसकी कुल सीटों का करीब 75 फीसदी। यानी बीजेपी को हराना है, तो इन सीटों पर पचास हजार से डेढ़ लाख तक वोटरों को बीजेपी से मुख्य विपक्षी पार्टी की तरफ शिफ्ट होना था, जो मुमकिन नहीं था। इसलिए बीजेपी ने अबकी बार 300 पार का नारा दिया था।
लोकतंत्र में जनता के फैसले से ऊपर कुछ जनता का फैसला बिल्कुल साफ है। प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है, कोई भी मोदी के आगे दूर- दूर तक नहीं दिख रहा। ये मैं पहले से कहता आ रहा हूं और ये अब देश की जनता ने एक बार फिर साबित भी कर दिया है। मैंने अपने निजी अनुमान में न्यूनतम 280 सीटें दी थीं, आखिरी दौर के चुनाव की 25 सीटों का अनुमान नहीं जता पाया था, मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि न्यूनतम की जगह अधिकतम का आंकलन बताता तो शायद फंस जाता, क्योंकि जितनी सीटें आई हैं, उतनी का अनुमान शायद ही लगा पाता। 280 से कम नहीं आएंगी, ये मैंने बताया था और 22 की रात में ये भी बता दिया था कि नंबर्स जो भी आए, दोबारा सरकार भाजपा की बनने जा रही, न कि एनडीए की। इस चुनाव में मेरे अनुमान के मुताबिक इकलौती सीट गाजीपुर ऐसी रही, जहां का नतीजा ये नहीं होना चाहिए था। मनोज सिन्हा की सीट फंसी हुई, तो शुरू से दिख रही थी, लेकिन मुझे लगा था कि शायद काम के आधार पर वोटर्स आखिरी वक्त में जीत दिला दें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बाकी बिहार के बारे में तो यूपी से बड़ी जीत का अंदाज़ा था ही। अमेठी की बात करें तो वहां के लोगों के वॉक्सपॉप (आम वोटर्स की बाइट) शुरू से कंफ्यूजन वाले थे, मसलन हम तो राहुल गांधी के कारण जाने जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री तो मोदी जी को बनना चाहिए टाइप्स, तो यहां कड़ा मुकाबला था। आखिरकार स्मृति ईरानी ने विरासत की सियासत को यहां से बेदखल कर दिया। हां रायबरेली में सोनिया गांधी को कोई दिक्कत नहीं हुई, कांग्रेस के लिए यही गनीमत है, वरना ज्योतिरादित्य जब गुना हार सकते हैं, तो रायबरेली भी जा सकती थी।
मोदी की आंधी ने यूपी में बुआ बबुआ और बिहार में आरजेडी के जातीय समीकरण को ध्वस्त कर दिया, जो बहुत जरूरी था, वर्ना जातिवाद की राजनीति ने इन दोनों राज्यों के विकास का बेड़ा गर्क कर रखा था। इनका जातिवाद भी सही अर्थों में जातिवाद का मुखौटा भर था, वर्ना परिवारवाद का ही बोलबाला था। मुलायम, शिवपाल, रामगोपाल, अखिलेश, धर्मेंद्र, डिंपल और इसके आगे समाजवाद खत्म। यही हाल बिहार में लालू, राबड़ी, मीसा, तेजस्वी, तेजप्रताप और यहीं तक सीमित सामाजिक न्याय। पप्पू यादव जैसे जमीनी नेता यादव होने के बावजूद लालू का राजनीतिक वारिस नहीं बन सके, पार्टी छोडऩी पड़ गई।
नवीन पटनायक की राजनीति ओडिशा तक सीमित है, अपने काम पर मेहनत करते हैं और फिर विधानसभा में जीत कर उनकी पार्टी आ रही है। किसी ने उन्हें ममता या नायडू या केजरीवाल की तरह राज्य छोडक़र केंद्र की राजनीति में, टकराव की राजनीति में उलझते नहीं देखा, नतीजा सबके सामने है। वजूद मिटना अगर किसी को कहते हैं तो वो है अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, जितनी तेजी से उभरी, उतनी ही तेजी से डूबी। दिल्ली में पिछली बार सातों सीट पर नंबर 2 थी, इस बार सातों सीट पर नंबर 3, यानी विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ होने के संकेत हैं। पंजाब से 4 सांसद थे, इस बार पंजाब में नंबर 4 पर पहुंच गई और अंत में उन मित्रों से कहना चाहूंगा जो मोदी के और ताकतवर होकर सामने आने से डर रहे हैं कि बेफिक्र होकर जैसे अपना काम करते हैं। वैसे ही करते रहें, मोदी के नाम पर जो असामाजिक तत्व डराएं, उनके बारे में आप खुद मोदी को बताएं, क्योंकि नतीजों के बाद कहा भी है कि सबको साथ लेकर चलूंगा, बदनीयती से काम नहीं करूंगा तो आप क्यों एकतरफा बदनीयती पाले हुए हैं और हां, तीन सौ पार तो हो चुका है, 500 पार भी हो जाए तो भी मुझे लगेगा कि मोदी या सरकार कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो देशहित या जनहित में है, तो मैं वैसे ही लिखूंगा, जैसा लिखता रहा हूं। उम्मीद करूंगा कि वो भी वैसी ही टिप्पणी करें, जैसी करते रहे हैं, शब्दों के ताकि मोदी और मजबूत हो। सकारात्मक पक्ष यह रहा कि विगत के चुनाव मे जहां जातीय समीकरण और लोकल मुद्दे हावी रहते थे, वही इस बार लोगों ने केवल देशहित को ऊपर रखा। मुफ्ती महबूबा का चुनाव हारना, इस बात का सबूत है कि मुसलमान भी यह समझ गया है कि मुस्लिम धर्मगुरु और छद्म राजनीतिक ठेकेदार उन्हें मिथ्या बीजेपी भय दिखाकर अपनी राजनीति चमका रहा है। मोदी और अमित शाह ने जमीनी स्तर पर बिना बदजुबानी किए चुनावी रणनीति तैयार की, जिसका परिणाम यह रहा कि बंगाल की स्पीड ब्रेकर दीदी चुनाव नतीजो के बाद दुबक गई।
बड़े बड़े डींग मारने वाली ममता बनर्जी और समस्त विपक्ष यह भूल चुका है कि जनता कद की नहीं, देश की इज्जत करती है और जब चाहेगी आपको बोरिया बिस्तर उठवा के राजनीति से बाहर करवा देंगी। आगे सतर्क रहते हुए उम्मीद की जाएगी कि जितने भी ममता जैसे हिंसावादी राजनीतिक चेहरे है, वो खुद को संतुलित करेंगे और स्वच्छ राजनीतिक माहौल बनाने मे सहयोग करेंगे। मोदी जी को पुन: देश का प्रतिनिधित्व करने हेतु शुभकामनाएं और अब उनसे जनमानस की अपेक्षाएं और ज्यादा होंगी। मसलन देश में पानी की समस्या में सुधार, देश की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता व देश की और ऊँची वैश्विक प्रगति। समस्त भाजपा और नवनिर्वाचित सांसदों को मेरी तरफ से हार्दिक बधाई और बेहतर करने का आग्रह।
जय हिन्द


पंकज कुमार मिश्रा
सहायक प्रोफेसर, स्वतन्त्र टिप्पणीकार जौनपुरी

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