अपना अस्तित्व खोती सिरोही तलवार - मिरर विशेष

अपना अस्तित्व खोती सिरोही तलवार

अरावली की गोद में बसा सिरोही शहर कई ऐतिहासिक कहानियों व किवदन्तियों को अपने में समेटे हुए है। क्षत्रिय “उडणा अखैराज” की भूमि और ऋ षि वशिष्ठ, गौतम, अम्बरीश व विश्वामित्र की यज्ञशालाओं का घर “सिरोही” अपने प्राचीन नाम “अर्बुद देश” के साथ देवनगरी नाम से भी प्रसिद्ध है। भारत में तलवार को हमेशा सें शूरता व क्षत्रिय का प्रतीक माना जाता रहा है इसलिए भारत के कई अलग अलग स्थानो में इसके लिए तलवार उद्योग स्थापित हुए और युद्ध के मैदान में उपयोगी होने के कारण राजाओं ने तलवार निर्माण उद्योगो को भी संरक्षण देना शुरू किया था। इन प्रमुख स्थानों के तलवार निर्माण उद्योगो में सिरोही ने भी अपनी स्थापना के समय से ही तलवार उद्योग स्थापित किया। मुगलकालीन भारत में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध थी कि ” सिरोही की तलवार, लाहौर की कटार “।

इस तरह उस समय की प्रचलित उक्तियों से सिरोही का नाम ही सिर+उही यानि सिर काटने वाली(तलवार) पड गया। कर्नल मेलसन के शब्दों में “सिराही सन्तों व शूरवीरों व धर्म पुराणों की धरती है, यह तपस्वियों की तपोभूमि, सूरताण जैसे शूरवीरों की भी भूमि ” हैं। यहां पर आठवीं से तेंरहवी शताब्दी तक परमार शासकों का शासन था। इसके बाद देवडा शासकों ने शासन किया। देवडा राजा रणमल के पुत्र शिवभाण ने 1405 ईस्वी के आसपास एक दुर्ग की स्थापना कर शिवपुरी नामक नगर बसाया। उनके पुत्र सहस्रमल ने दो मील आगे ईस्वीं सन् 1425 एक नया नगर बसाया जिसे आज सिरोही के नाम से हम जानते है। ऐसे मे सिरोही की स्थापना के साथ ही तत्कालीन शासको ने आर्य समाज रोड पर लौहारो व म्यांनगारों को तलवार उद्योग के लिए संरक्षण देना शुरू किया। इन्ही मोहल्लों में उस समय स्थापित हुए लौहारों का मंदिर व केशवनाथजी म्यानंगारों का मंदिर अपनी स्थापना की कहानी कह रहे है।

तलवारों के प्रति शासकों की दीवानगी
सिरोही के महाराव लाखा (सन् 1458 ईस्वीं) सिरोही की तलवार को लाखिनी के नाम से (लाख गुणों वाली) सम्बोधित किया और कारीगरों को निर्माण के लिए प्रोत्साहन दिया। महाराव लाखा कुशल योद्धा एवं तलवार के धनी थे। महाराज अखेराज प्रथम ( सन 1500 ईस्वीं ) के समय अखेशाही तलवार विकसित की गई थी जो बहुत लचकदार थी। यह लचक आधुनिक नैनो टैक्नोलॉजी के कारण थी जो उस समय विकसित की गई थी। महाराव दुर्जनशाल के समय छोटी तलवारे विकसित की गई थी जिसे आसानी से छुपाया जा सकता था। इस तलवार को दुर्जनशाही के नाम से जाना जाता था। सिरोही के राजा महाराव मानसिंह तृतीय ईस्वीं सन् 1705 से 1749 के समय तलवार उद्योग चरम सीमा पर था। तत्कालीन राजा महाराव मानसिंह तृतीय के सुझाव पर डिजायन ”मानशाही तलवार” विश्व प्रसिद्ध थी।
तलवार का गणितीय माप
सिरोही की तलवार का एक स्टेण्डर्ड नाप होता था जिसकी लम्बाई 1 हाथ 1 बैंत होती थी। कुछ तलवारे सीधी होती थी और कुछ चाप आकार की होती थी इनकी मूंठ की लम्बाई भी तलवार के अनुसार होती थी। जिसकी लम्बाई लगभग 8 अंगुल होती थी इसी तरह छुरिया, गुप्ति (डण्डे के रूप में छुपी हुई तलवार) कटार, जम्बिया (हाथ में पकडने वाली छोटी कटार) का नाप भी स्टेण्डर्ड होता था।
तलवारो के प्रकार
रोटी तलवार
रोटी के आटे की तरह लोहे को पीट-पीटकर गुंथने की विशिष्ट प्रक्रिया के कारण इसे रोटी तलवार के नाम से जाना जाता था। यह तलवार कम गोलाई की होती है। इसमें फौलाद की सात-आठ पत्तियों को मोरथोथा (कॉपर सल्फेट) सँखिया या हल्दिया जहर (आर्सेनिक सल्फाइड) हिगलू (मरक्यूरिक सल्फाईड) आदि का मसाला मिट्टी और गोबर व काली गजवेली बालू (सिलीकन ग्रिट) के घोल का लेप इन पत्तियों पर लगाकर उसे तार से बांधा जाता था फि र उनको गर्म करके एरण ( हार्ड स्टील बेस ) पर पीट-पीटकर रोटी की तरह गूंथा जाता था इस तरह पुन: पीट- पीटकर एक रूप बनाया जाता था। पांच सेर का लोहा परत के रूप (ऑक्सीडाइज) से उतरने के बाद केवल एक दो सेर रह जाता था फि र उसे तलवार का रूप देकर उसे हाथ से घुमने वाले खरण (हाथ से निर्मित एमरी व्हील) पर घीसकर उसका फ ाल तैयार किया जाता था उसके बाद में गजवेली बालू (ब्लेक सीलीका ग्रिट) एवं गोबर के पेस्ट से लेपकर पुन: आरण ( भट्टी ) में डालकर पुन: गर्म किया जाता था। खुशवंत मिस्त्री का मानना है कि इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि सिलीका ग्रिट गोबर में उपस्थित कार्बन कण एवं लोहे के साथ क्रिया करके सिलीकन कार्बाइड के नैनो कणों का निर्माण होता है जो की तलवार के लोहे के साथ में विन्यासित (इंप्रिग्रेट) हो जाते है आज कल इस सिलीकन कार्बाइड का उपयोग ड्रिलींग बीट, पत्थर काटने का कटर आदि में किया जाता है। इसके बाद में तलवार को भट्टी से निकालकर ठण्डा करने के बाद उसे पुन: गर्म किया जाता था तथा नीलकण्ठ महादेव मंदिर की बावडी के पानी से तलवार की धार को पाण (टेम्परींग) दी जाती थी।
खुशवन्त मिस्त्री भू-गर्भ वैज्ञानिक ने बताया कि सिरोही की नीलकंठ बावडी जो की अरावली पर्वतमाला के नीचे स्थित है उसका ऊपरी भाग राजपुरा बालदा पहाडी से जुडता है और राजपुरा बालदा में टंगस्टन का खनिज (वोलफ्रोमाइट) पाया जाता है इस वोलफ्रोमाइट के टंगस्टन के कण/आयन इस पानी के साथ मिले होते है जब गर्म तलवार को इस पानी के साथ ठण्डा किया जाता है जिसे पाण देना या टेम्परिंग कहते है कि प्रक्रिया में टंगस्टन कण लोहे के साथ एक मजबूत धातु बंध (मेटेलिक बॉण्ड) बनाते है जिसके कारण से तलवार में मजबूती आ जाती है, आखिर में इसे पुन: खरण पर घिसने के बाद हाथ से तेल एवं पोलिश द्वारा चमक लाई जाती है जो तलवार के फ लको के ऊपर संकेन्द्रित नैनो संरचना (कोन्सेन्ट्रिक रिंग स्ट्रक्चर) बनती है जिसे लोकल भाषा में ज्वर कहा जाता है तलवार की सतह पर उभर आते है। यह संरचना नैनो स्ट्रक्चर की उपस्थिति प्रदर्शित करती है।
सिलीकन कार्बाइड के नैनो कणों व टंगस्टन कण लोहे के साथ एक मजबूत धातु बंध (मेटेलिक बॉण्ड) के कारण यह तलवार इतनी मजबूत होती है कि एक कुशल तलवार चालक एक मोटे नीम के तने को एक झटके से काट सकता है। जहरीले मसाले मोरथोथा (कॉपर सल्फेट) सँखिया या हल्दिया जहर (आर्सेनिक सल्फाइड) हिगलू (मरक्यूरिक सल्फाईड) आदि के कारण इस तलवार के धार का घाव इतना जहरीला होता था कि जो कभी ठीक नहीं होता था तथा व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी। इस तलवार पर जंग भी नहीं लगता था ।
बंट
यह तलवार भी रोटी की तरह बनती थी परन्तु इसमें मसाला लगा हुआ नहीं होने के कारण जहरीली नहीं होती थी।
असील
यह बहुत लचकदार तलवार होती थी। इसे भी रोटी की तरह ही गुंथकर बनाया जाता था। इस तलवार को दोनो तरह से मोडने पर मुड जाती थी और छोडने पर एक झटके में अपनी पूर्व स्थिति में आ जाती थी। यह एक स्प्रिंग पट्टे की तरह होती है। इस तलवार के निर्माण के लिए मसाला व लोहा मालवा से आता था और साथ ही कुछ पेड की पत्तिया जैसे की मदार (आक) व आवल की पत्तिया, गजवेली बालू और गोबर का लेप का उपयोग इसके निर्माण में किया जाता था। लोहे को गर्म करके एरण ( हार्ड स्टील बेस ) पर पीट-पीटकर रोटी की तरह गूंथा तथा पीटा जाता था व लोहे को तलवार का रूप दिया जाता था फि र तलवार की धार को ठण्डे तेल में पाण (टेम्परींग) दी जाती थी। अन्त में उसको पोलिश करके तैयार किया जाता था तो इस प्रक्रिया के दौरान एक तरंगीय संरचना (वेवी स्ट्रक्चर) उसकी सतह पर उभर आती थी और तलवार को अंतिम रूप दिया जाता था। तलवार की सतह पर उभरी तरंगीय संरचना (वेवी स्ट्रक्चर) कार्बन नैनो ट्यूब की उपस्थिति प्रदर्शित करती है। आयरन कार्बाइड के साथ कार्बन नैनो ट्यूब संरचना साथ ही उसमें उपस्थित कुछ दुर्लभ मृदा तत्व जैसे वेनेडियम तथा मॉलिब्डेनियम की उपस्थिति तथा आयरन व कार्बन नैनो ट्यूब संरचना की उपस्थिति तलवार को लचकदार एवं यांत्रिक दृढता प्रदान करती थी जिसके कारण तलवार बहुत अधिक लचकदार (फ्लेक्सीबल) होती थी। इस कारण से यह तलवार एक नागीन की भांति लचकदार और मजबूत होती थी।
सांकिला
साकीला एक सीधी तलवार होती थी जो रोटी की तरह ही बनायी जाती थी। तलवार के बीच का भाग दबा हुआ होता था इसके बारे में एक मशहूर कहावत थी कि ”जो बांधे सांकेला वो फि रे अकेला।”
नलदार
यह चन्द्र आकार की तलवार होती थी। यह फौलाद से बनाई जाती थी । जिसके फ ल के बीच में एक नाल होती थी।
अलेमान
यह नलदार की तरह ही होती थी। इसे धारूजल भी कहा जाता है क्योंकि जैसे ही पेट में घुसती थी तो तलवार में बनी नाल से खुन की धार बहती है।
मोतीलहर
यह फौलाद से बनी हुई तलवार होती है जिसके तलवार के बीच में जगह-जगह पर (स्लोट) बनाकर छर्रे डाले जाते है जब तलवार को म्यान से बाहर निकालते है तो छर्रे आगे पीछे होने से आवाज आती थी।
लहरीया
यह तलवार अग्रेजी में ”वी” आकार के फौलाद के टुकडों को जोडकर बनायी जाती है तथा पीट-पीटकर एक रूप (होमोजीनियस) बनाया जाता था। इस तलवार को सम्मानित व्यक्तियों एवं राजाओं के पास रखने की प्रथा थी। इसके अलावा नागफणी-नागफण के मुठ वाली, कीरच-एक साधारण तलवार की तरह होती थी जो पहरेदारो के काम आती थी। इसके अलावा अखेराजशाही, मानशाही, दुर्जनशाही, खाण्डा, तमचे वाली जिसमें बन्दुक लगी हुई होती थी। फलसी आदि तलवारे भी प्रसिद्ध थी। तलवारो के मूठ के विभिन्न रूप होते थे जिसमें नागफणी का आकार, खरगोश पकडे हुए चीते के मुंह का आकार आदि तथा इन मूठो के ऊपर सोने एवं चाँदी के बर्क चढाए जाते थे तथा चांदी के तार से विशेष प्रक्रिया द्वारा कलाकृतिया भी बनायी जाती थी। म्यानगरो द्वारा चमडे एवं मखमल के कलाकृतियो द्वारा म्यान तैयार किए जाते थे जो तलवार की सुन्दरता बढाते थे। प्राचीन धातु कर्म के क्षेत्र में किए गये कार्यो पर विस्तृत शोध की आवश्यकता है ताकि इस आधुनिक युग में उपयोग किए जाने वाले नैनो तकनीकी सम्बन्धी कई जानकारीयां एवं धातु कर्म से सम्बन्धित एलोय (धातु मिश्रण ) के बारे में जानकारी प्राप्त कर सके।

तलवारो से जुडी अनेको किवदंतिया
किवदंती 1:- यूनानी आक्रांता सिकन्दर महान के दरबार में जब कैकेयी नरेश पौरूष को उपस्थित किया गया तब सिकन्दर ने यूनानी तलवार की शक्तियों का प्रदर्शन दिखाने के लिए लोहे की छड़ को दो भागों में बाट दिया था, इसके जवाब में राजा पुरू ने रेशम के कपडे को हवा में उछाल कर सिरोही की तलवार से उसके दो टुकडे कर दिए।
किवदंती 2:- राजस्थान की रणभूमि अपने त्याग और बलिदानों के कारण विख्यात रही है। और ऐसी दीवानगी मानसिंह द्वितीय की थी, वे मानशाही तलवार की नोंक से अफीम का रसास्वादन करते थे।

किवदंती 3:-देवडा बीजल राय के सम्बन्ध में तो उक्ति प्रसिद्व है कि वे अपनी ‘अणी’ को हमेशा आकाश में उठाए रखते थे।

किवदंती 4:- सिरोही की तलवार की कहानी में एक कहानी दत्ताणी के युद्ध से भी जुडी है, जो कि सिरोही के राव सुरताण द्वारा मुगल सम्राट अकबर के विरूद्ध लडा गया था जिसमें मुगल सेना को पराजित होना पड़ा था।
पानी से देते थे धार
सिरोही व आसपास के रजवाडों में सिरोही की तलवार अपने वार व धार के लिए प्रसिद्ध थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां की एक बावडी के पानी से तलवार को धार दी जाती थी, इतना ही नहीं बावडी के पानी मेें इतनी ताकत थी कि यह धार तेज और स्थायी रहती थी, यह बावडी नीलकंठ बावडी के नाम से आज भी अपने तत्कालीन स्वरूप में मौजूद है, किन्तु आवश्यक कारणों से इसे वर्तमान में बंद कर दिया है।
सिरोही तलवार उधोग की वर्तमान स्थिति
प्रशासन के कमजोर प्रयासों व असहयोग की भावना के चलते तलवार बनाने वाले परिवार अब सिमट के रह गए है। पुराने समय में मालवा से आए मालवीय तलवारसाजों के परिवार आज शहर में गिने चुने रह गए है। तलवार उद्योग को व्यवसायिक संरक्षण न मिलने के कारण सिरोही शमशीर का उत्पादन सीमित रह गया है। एक समय में सिरोही में करीब 500 परिवार तलवार निर्माण का कार्य करते थे, लेकिन अभी यह चार या पांच परिवारो तक सीमित रह गया है।
तलवार साजो की व्यथा
सिरोही की तलवार निर्माण कला को अपने पुश्तैनी रोजगार के रूप में चला रहे शहर के तलवार साजों में तलवारों की घटती मांगो के कारण व्यथित है। इन तलवार साजों की एक मुश्किल यह भी हैं कि इनके बाद यह पारम्परिक कला पूरी तरह विलुप्त हो जायेगी, क्योंकि इस कला को जीवित रखने में इनके पुत्रो ने अन्य रोजगार की संभावना के चलते कोई रूचि नहीं दिखाई है।
पारम्परिक तलवार बनाने की जद्दोजहद
सिरोही शहर में राजाओं के समय के मालवीय लौहार के वंशज वर्तमान में आर्य समाज रोड़ पर रहते है। जो कि जैसे-तैसे गुजर कर रहे है। इनके दादा व परदादा रोटी तलवार बनाते थे जो आज सामन्तो में घटती मांग के कारण रोटी तलवार लुप्त हो गई है।
शोध व अनुसंधान की आवश्यकता
प्राचीन काल से ही व्यवस्थित रूप चला आ रहा तलवार उद्योग आज खत्म होने के कगार पर है। सरकारी संरक्षण व प्रयासो के अभाव में आज स्थानीय म्यांनमार उद्योग को समेंटने लगे है। बाजार में बढती जारी व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते जैसी-तैसी तलवारें सिरोही की तलवारो के नाम से खूब बिक रही है। पुराने समय से चली आ रही तलवार निर्माण की लम्बी प्रक्रिया और लोगों में घटती मांग का कारण भी कही न कही इनके लिए समस्या बना हुआ है। आज बाजार में बीसीयों दुकान है जो सिरोही तलवार के नाम से अपने ब्राण्ड को बेच रहे है। मगर इस सिरोही तलवार बनाने की प्राचीन कला को लेकर चल रहे वंशजो की सुध लेने की न तो प्रशासन के पास जागरूकता है न जानने की इच्छा। तलवारो के प्रति लोगो का घटता जा रहा आकर्षण ‘धारदार शस्त्र’ न रखने की शासकीय पाबन्दी भी आडे आ रही है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: