अन्तर्जातीय विवाह में बेहतर दाम्पत्य संबंध पर चिंतन जरूरी

आइए तलाशें आधुनिक समाज में अन्तर्जातीय विवाह के मायन

सभी समाज में निरन्तर बढ़ते जा रहे अन्तरर्जातीय विवाह संबंधों के कारण भविष्य के खतरों और संभावनाओं पर बहस प्रारंभ हो चुकी है। क्या यह परिवार के बड़ों का बच्चों पर खत्म होते जा रहे नियंत्रण का परिणाम है? क्या यह किसी भी समाज में लैंगिक सन्तुलन गड़बड़ाने के कारण है, क्या यह युवा पीढ़ी को जाति बंधनों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल है, क्या यह भारतीय समाज समाज के एक और बड़ी तथा नई दुनिया की ओर हाथ बढ़ाने की दिशा में एक कदम है या सामाजिक संगठनों के भीतर की दीवारों के दरकने का संकेत है?
निसंदेह चिंतन की वजह जो भी रही हो, शिक्षा के पर्याप्त अभाव में परम्परा, इतिहास, ज्ञान विज्ञान में स्वयं को अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझने का अहं एक ओर हमें अपने ही बनाए चक्रव्यूह से बाहर नहीं आने देता। दूसरी ओर कभी कभी तथाकथित सामाजिक क्रांति या भावावेश में लिए गए निर्णयों को जबरन समाज के सामने जस्टिफाई करने के जोश में युवा पीढ़ी के बहकते कदमों को वे खुद एक नई पहल का नाम दे देते हैं।
प्रश्न यह है कि इन अन्तर्जातीय विवाह संबंधों से समाज को और भी सशक्त बनाने के लिए हमारी पूर्व तैयारी क्या हो, मार्गदर्शी बुजूर्गों की भूमिका क्या हो? दोनों पक्षों के अभिभावकों को ऐसी स्थितियां उत्पन्न होने के साथ ही परस्पर संवाद और दोनों ही परिवारों की इन संबंधों के प्रति सहमति का वातावरण तैयार करना उनका पहला दायित्व बनता है। बच्चों के निर्णय को सामाजिक स्वीकृति देने और उससे भविष्य के लिए स्थायी समझ की परिस्थितियां बनने पर ऐसे वैवाहिक संबंधों की खुशबू एक पृथक प्रभाव छोड़ेगी- ऐसा विश्वास है। प्राय: देखा यह गया है कि इस प्रकार के विवाह संबंधों के कारण प्रभावित परिवारों का अन्य जाति, कुटुम्ब, परिजन से परस्पर व्यवहार कम होता जाता है और जब जैसे वे समझने लगते हैं कि ऐसे उनकी या उनकी हमें कोई जरूरत नहीं है।
इसे स्वयं समझने और फिर निरन्तर जुड़ाव के अवसर खोजते रहने की कोशिश भी दोनों पक्ष के माता पिताओं का दायित्व बनता है। ऐसा होने पर इन विवाहों से समाज में सद्भाव भरे वातावरण का विकास हो सकेगा और बच्चों को भी संबल प्राप्त होगा। अन्तर्जातीय विवाह के स्वस्थ और सामाजिक स्वीकृति से भरे स्वरुप को विकसित करने की दिशा में अब अभिभावकों को गंभीर हो जाने की आवश्यकता है। युवक युवतियों का अचानक सम्पर्क में आना, भावावेश में विस्फोट की तरह वैवाहिक संबंध में बंध जाना, माता-पिता की विवशता, गुस्सा, धमकी, कभी कभी हद से बाहर जाकर मारपीट, आपराधिक कदम भी और बाद में ले देकर समझौते की राह। इस सारी बेढ़ंग प्रक्रिया में ऐसे दम्पती समाज का अंग नहीं बन पाते हैं, बल्कि मुख्य धारा से कट जाते हैं। यह एक प्रकार से सामाजिक जीवन में इन दम्पत्तियों का बहिष्कार है, जो एक सभ्य समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इन सभी परिस्थितियों में अन्तर्जातीय विवाह को सम्मानजनक मान्यता मिले, अनायास भावावेश में ले लिए गए निर्णय पर सजा के बतौर इन युवक युवतियों को समाज हेय दृष्टि से न देखें। उदाहरणपूर्वक एक प्रकार से समाज में पुनर्वासित करने का सकारात्मक वातावरण बने, इसके लिए आवश्यक होगा कि-

  1. यह पड़ताल कर ली जाए कि इस प्रकार के संबंध बनने के पीछे दोनों ही पक्षों की नीयत क्या है? आर्थिक सम्पन्नता को देख लडक़े या लडक़ी का अपने माता-पिता की शह (या स्वयं के ही निर्णय से) से ऐसे रिश्तों को हवा देना भविष्य के लिए सुखद नहीं है। यदि ऐसे संबंध अपरिपक्व उम्र के आकर्षण से उत्पन्न होकर माता पिता की स्वीकृति बिना पनपते हैं, तो जिम्मेदार अभिभावकों को इन पर रोक लगानी चाहिए। यहां प्रभावी समझाइश ही एकमात्र तरीका है।
  2. ऐसे संबंधों के औचित्य को हम तब नकार नहीं सकते, जब उम्र, योग्यता और सुविचारित पारिवारिक निर्णय के तहत बच्चों को यह स्वतंत्रता दी जाती है कि वे अपना मंच वृहत समाज में जाति, कुटुम्ब, की वर्जनाओं से ऊपर जाकर खोजे, उनके इस प्रयास में हर कदम घर के बड़े मार्गदर्शी बनकर खड़े रहे और तब ऐसे संबंध बनना सुनिश्चित हो जाता है, जिनकी उम्र लम्बी होती है। इन पंक्तियों के लेखक को लगता है कि अन्तर्जातीय विवाह संबंधों की वे सारी वजहें, जिनका जिक्र प्रारंभिक पंक्तियों में किया गया है, के कारण परिवारों में ऐसा कदम उठाया जाए, तो वह उदार सामूहिक सहमति का होना चाहिए।
  3. भारतीय सामाजिक संगठन की विशेषता यह है कि वह अनेक धर्म, जाति, गोत्र, शाखा, प्रशाखा, पूजा व आचार पद्धतियों वाले समूह में विभाजित है। हर समूह अपनी जातिगत अस्मिता को बनाए रखना चाहता है। यह अच्छा भी है। क्योंकि एक विशेष काल, परिस्थिति और राजनीतिक, सामूहिक कारणों से सुविधापूर्ण स्थानों में आकर छोटे छोटे समूह बसे। समूह जिसे जाति के रूप में जाना गया कि स्थापना अपनी परम्परा व संस्कृति की रक्षा के साथ कुछ श्रेष्ठ मौलिक विशेषताओं की पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। आज जब समस्त मानव समाज सिंगल अम्ब्रेला सिस्टम में एकजुट होने की ओर गतिशील है, तब अन्तर्जातीय विवाह संबंध समावेशी समाज व्यवस्था के गेटवे पर एक संभावना की नई राह खोलता है।
    बहुत समझ बूझकर दाम्पत्य संबंधों के बीच नई सोच की इस हवा में सांस लेने का मानस बनाए- इस उम्मीद के साथ शेष सुधी पाठकों के लिए…।

डॉ. राकेश तैलंग
शिक्षाविद्, द्वारकेश मार्ग, कांकरोली

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